Post terribly tiny tales, time for #6WordStory

By the term, it is clear that terribly tiny tales are the shortest form of story telling but here are some guys who have brought stories to just 6 words. And when you read ’em, you find that they are complete in their sense. In the age of the internet when the expression has become limited to 140 characters…you can for sure cherish these shortest form of stories. So, here they are and they are by WHATASHORT…

जाने-अंजाने में मोदी सरकार कहीं नॉन वेज को बढ़ावा तो नहीं दे रही

‘अच्छे दिन आने वाले हैं’…आपको मोदी सरकार का ये वादा तो याद ही होगा! लेकिन जो हालात हैं उन्हें देखकर सबकुछ उल्टा-पुल्टा सा लगता है. देश के तमिलनाडू और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में हालात ये हैं कि एक आबादी ने तो दाल छोड़कर मुर्गी और अंडा खान चालू कर दिया है. वहीं चुनाव के दौर से गुज़र रहे बिहार के लोगों ने बताया कि उन्होंने तो चावल के साथ दाल की जगह चटनी को सहारा बना लिया है. वोटर्स के एक तबक के कहना है कि वो यह नहीं समझ पा रहे कि दाल की बढ़ी कीमतें चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बन पाईं.

दिल्ली में अरहर दाल 180 रुपए किलो बिक रही है. वहीं चिकन की कीमत 130 रुपए किलो है. आप दाम में फर्क खुद कर लीजिए. बाकी की दालें भी 100 रुपए से महंगी बिक रही हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि जल्द ही दाल की कीमतें 200 के पार चली जाएंगी. साल 2013 में एक रिपोर्ट में ये तो ज़रूर बता दिया गया कि लोगों के गुज़ारे के लिए 32 रुपए रोज़ाना की रकम काफी हैं लेकिन इस बात पर रौशनी कौन डालेगा कि 180 रुपए किलो की दाल में 25 रुपए रोज़ाना का गणित कैसे बैठेगा.

ब्राहम्ण-बनियों की सरकार मानी जाने वाली बीजेपी के नेता एक तरफ तो बीफ बैन का विरोध कर रहें हैं वहीं सरकार जाने-अंजाने में नॉन वेज को बढ़ावा दे रही है. लेकिन इन सब में वो तबका हमेशा ठगा सा महसूस कर रहा है जिसे अच्छे दिन के सपने दिखाए जाते हैं. बिहार चुनाव में एक बार फिर से जाति और धर्म मुख्य मुद्दा बन गए हैं. वोटर्स से बात करने पर गाय पर हो रही राजनीति सतह पर आ जाती है लेकिन 8 नंबवर को जब विधानसभा चुनाव के नतीजे आ जाएंगे और अगले पांच साल के लिए सरकार तय हो जाएगी तब कोई गाय की बात नहीं करेगा और महंगाई जस की तस बनी रहेगी. वोटर एक बार फिर थोड़ा उनकी वजह से और थोड़ा खुद की वजह से ठगा जाएगा और अच्छें दिनों के इंतजार में ये सरकार भी बीते जाएगी और पाले आएगा कोई नया जुमला!

No Bra Day! Ladies Day Out!

Don’t fix it,

Don’t lift it,

Remove the strap,

And let it live free

Without any wrap

Yes, it’s all about boobies, I know the word might have fantasised you, but it’s the time to stand for this fantasy. What better way can be to express the way we feel than to support a full day of boobie freedom?? Today, October 13 is being celebrated nationally as a No Bra Day. It’s the ladies day out to leave their breasts free for 24 hours and show the world what they are blessed with. This initiative has been taken forward in support of Breast cancer that is something to be seriously checked for. In India, I don’t think anybody will ever follow this trend and celebrate this day with the same thought and belief. Instead, it will be looked upon as a shame and ladies might become prey to many types of humiliations. Rather, not to blame the society and think upon the pros and its cons let’s just stand forward and take a step to living freely and let their boobies free too.

कुलकर्णी पर फेंकी गई स्याही को तेज़ाब बनते देर नहीं लगेगी

साल 2011 में पाकिस्तान के पंजाब सूबे के तत्कालीन गवर्नर सलमान तासीर के कत्ल की ख़बर ने पाकिस्तानियों के साथ बाकी दुनिया को भी सकते में डाल दिया था. तब शायद ही किसी को गुमान हुआ कि ये ऐसे घटनाएं भारत में भी घटने लग जाएंगी. दरअसल, सलमान तासीर को उनके दो बॉडी गार्ड्स ने इसलिए मौत के घाट उतार दिया था क्योंकि वे पाकिस्तान के ईशनिंदा (पैगंबर मोहमम्द आलोचना) के तत्कालीन कानून से इत्तेफाक नहीं रखते थे. सलमान तासीर अपने ही मज़हब में मौजूद कमज़ोरियों के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई में मार दिए गए. वे मुसलमान थे,पाकिस्तानी थी, ऊंचे ओहदे पर विराजमान थे, लेकिन धर्म के उन्माद ने उनकी जान ले ली.

अब आज के भारत में लौटते हैं. सुधींद्र कुलकर्णी पर शिवसेना वालों ने इसलिए स्याही फेंक दी क्योंकि वे पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शिद महमूद कसूरी की किताब के लॉन्च के प्रमुख आयोजक थे. कुलकर्णी बीजेपी के लौहपुरुष अडवाणी के मीडिया सलाहकार रहे हैं. जब इस दौर का इतिहास लिखा जाएगा तब अडवाणी का नाम भारत के विराट हिंदुओं में लिखा जाएगा. उनका नाम शायद बाला ठाकरे जैसे विराट हिंदू से तो  ऊपर ही होगा. कुलकर्णी हिंदू हैं,भारतीय भी हैं. अडवाणी जैसे विराट हिंदू के सलाहकार भी रहे हैं,लेकिन इन सबके बावजूद उन्हें बख्शा नहीं गया. कुलकर्णी के मुंह पर स्याही फेंककर शिवसेना ने खुद को ज़्यादा हिंदू और ज़्यादा भारतीय साबित कर दिया. ठीक वैसे ही जैसे सलमान तासीर के हत्यारों ने उनकी हत्या करके खुद को ज़्यादा मुसलमान, बड़ा मुसलमान साबित किया था.

साल 2014 में पाकिस्तान के शहर पेशावर में एक आर्मी स्कूल पर आतंकी हमला हुआ, इसमें 145 लोगों की हत्या हुई, जिनमें ज़्यादातर छोटे-छोटे मासूम स्कूली बच्चे थे. हमले करने वाले किसी दूसरे देश से नहीं आए थे, बल्कि पाकिस्तान सरकार के जरिए पाले गए सगे आतंकवादी थे. पाकिस्तान इस्लाम, भारत विरोध और कश्मीर के नाम पर इन्हें सालों से पालता आया है. आज इनके पालतू इन्हें ही नोच रहे हैं.

पिछले कई महीनों से भारत भी पाकिस्तान हो चला है. अगर आप इसी तरह बर्दाश्त करते रहे तो आपको पता भी नहीं चलगा कि स्याही कब तेज़ाब बन गई. आप पाकिस्तान और उन जैसे धर्म के उन्माद से भरे देशों की हालत देख सकते हैं. किसी की नफरत को आधार बनाकर पलने वाला देश पाकिस्तान हो जाता है. अब हमें ये तय करना होगा कि सालों से धार्मिक भाईचारे की परंपरा के बूते टिके रहने वाली धरती को उसी ढर्रे पर बरकरार रखना है या आतंकवादियों और दहशतगर्दों को सौंप देना है?

सलमान तासीर के तर्ज पर हम पहले से ही कलबुर्गी, पनसारे और दाभोलकर को खो चुके हैं, अगर ऐसी ही गुंडई जारी रही तो कल गए ये आंतकी हमारे बच्चों के स्कूलों पर भी हमला करने लगेंगे. हमें इनका जमकर सामना करना पड़ेगा…समाज के लिए, देश के लिए,मानवता के लिए और अपने बच्चों के भाविष्य और उनकी जान के लिए!

Double Trouble for couples

First day first show of Bigg Boss 9 was screened on the television with its lively set-up and dazzling interior which has beautifully integrated their show timings. The show is all set to bring on ‘Double Masti with trouble’.

14 contestants or 7 couples will now abide to be on the ride for the next three months. The added ingredient was the presence of media panel on the show. Every participant was first interviewed by the panelists and then they stepped ahead to enter the mansion. In order to add little pinch of salt, journalists came to the limelight. Once there was a time when journalism never needed any platform for their promotion, in my opinion their presence in the show was not a part of ethics that they were taught about.

Though for the makers of the show it was a nice and different integration, but according to a journalistic view they are losing their importance.  Journalists are those who rule the show, but here the matter is the other way round. To be a part of reality show for not covering the event but getting covered is something not expected to be a belief of journalism.

People guessed many big (controversial) names to be a part of this Bigg Boss 9 like Radhe Maa and MSG but as we know, all the wishes are not to be fulfilled. To know about their complete list of contestants check out this:

http://www.ibtimes.co.in/bigg-boss-9-check-out-final-confirmed-list-contestants-photos-650095

एक पत्रकार का समाज को खुला खत!

राजनीति की कड़िया सुलझाते-सुलझाते अब मैं खुद में ही उलझने लगा हूँ, अपने अस्तित्व पर ही सवाल करने लगा हूँ. समझ नहीं पाता मैं क्या हूँ? क्या मैं दलाल हूँ, वेश्या हूँ या फिर न्यूज ट्रेडर हूँ? क्या मैं सचमुच प्रेस्टीट्यूड हूँ? क्या मैं वो नहीं हूँ जो रोजाना गलियों में पिटता है, कभी निर्भया तो कभी गुडिया के लाठी खाता है? क्या मैं वो नही हूँ जो कभी शाहजहाँबाद तो कभी बलघाट में जलाया जाता हैं? क्या मैं वो नही हूँ जो कभी आपातकाल तो कभी दंगों में उन लोगों के लिए खड़ा होता हूँ जो कभी मेरे लिए खड़े नहीं हुए? इन सिक्के के दो पहलुओं से मिलकर ही तो मैं बनता हूँ. मुझसे ओब्जेक्टिविटी की आशा करने वाले बुध्दजीवी हमेशा मेरे लिए दलाल और प्रेस्टीट्यूड जैसे विशेषणों का ही इस्तेमाल करते हैं. उन्हें मैं नेताओं के घर आते जाते तो दिखता हूँ पर देश के पाँच सबसे गरीब जिलों में भटकते हुए नहीं. क्या वो मेरे सिक्के के सिर्फ एक पहलू को नहीं देखते हैं?

लोग मेरे सामने खड़े होकर ही मुझे गाली देते हैं. मेरी विश्वसनीयता पर सवाल करते हैं. अच्छा है कि बोलते है, सवाल करते है, मुझसे डरते नहीं. कभी सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ बोलकर देखिए. गालियों से आपकी बोलती बंद न कर दी जाये तो कहना. आप 19(a) से लेकर 66(a) सब भूल न जाए तो कहना. लेकिन मैं फिर भी लिखता हूँ हर रोज लिखता हूँ. क्यों लिखता हूँ? किसके लिए लिखता हूँ? मैं लिखता हूँ क्योंकि मुझे परवाह हैं आपकी. मैं चुप हो गया तो आवाज आपकी बंद होगी. कोई शक हो तो सोच कर देखिए कि जिन लोगों की आवाज मैं नहीं उठाता क्यों उनकी आवाज दब कर रह जाती हैं? गुड़गाँव, सूरत और दिल्ली की मजदूर बस्तियों में गुलामों की तरह रहने वाले मजदूर तभी चर्चा में क्यों आते हैं जब मैं वहाँ जाता हूँ? आपके चुने हुए प्रतिनिधियों के सामने आपका प्रतिनिधित्व मैं करता हूँ. आप मुझे चुनते नहीं,वोट नहीं देते. मुझे 6 रुपये में खाने की थाली नहीं मिलती, रहने को सरकारी घर नहीं मिलता. फिर मैं क्यों करता हूँ ये सब आपके लिए, उनके लिए जिनके लिए मैं महज एक दलाल हूँ, सत्ता और कॉरपोरेट का दलाल? मैं सरकार बना सकता हूँ, गिरा नहीं सकता. मैं मोदी और केजरीवाल बना सकता हूँ, उनसे काम नहीं करा सकता. मैं ताकतवर की तरफ होने पर ताकतवर होता हूँ कमजोर की तरफ होने पर कमजोर होता हूँ. लेकिन मैं कमजोर नहीं हूँ. मैं देश के प्रधानमंत्री की भी आँखों में आँख ड़ाल सवाल कर सकता हूँ. कमजोर आप हैं क्योंकि आप सवाल नहीं करते. नेताओं को पता है कि मैं कितनी भी मजबूती से आपके लिए खडा रहूँ आप को चुनना उसी को है. आपकी यही कमजोरी मुझे कमजोर करती हैं.

फिर भी मैं आपके सवालों पर, आरोपों पर चुप रह जाता हूँ. इसलिए नहीं की मैं सचमुच दलाल हूँ बल्कि इसलिए कि मैं खुद मे ही उलझने लगा हूँ खुद से ही सवाल करने लगा हूँ. मेरे अंदर भी एक द्वंद है क्योंकि मैं यहाँ कुछ बदलने आया था. पर मुझे हर पल सीख दी गई कि मैं कोई समाज सेवक नहीं हूँ, क्राँतिकारी नहीं हूँ. मेरी नैतिकताओं से मुझे ही बंधक बना दिया गया. और शायद धीरे-धीरे मैंने भी समझौता कर लिया. और करूँ भी क्यूँ न? सारी बगावत मैं ही नहीं करुंगा. कुछ जिम्मेदारी आपकी भी बनती है. फिर भी मेरी आत्मा मेरे शरीर से हर रोज सवाल करती है, बगावत करती है. मैं मरता भले ही न हूँ पर खुद मे ही घुटता जरूर हूँ. मुझे अपने ही आदर्शों और उम्मीदों की अर्थी का बोझ उठा कर चलना होता हैं. शायद इसलिए मैं आपके सवालों का जवाब नहीं दे पाता और जवाब भी क्यूँ और किसके लिए? उन नपुंसक लोगों के लिए जो अपनी असफलताओं को हमेशा मेरे ऊपर थोप देते हैं. सारी समस्याओं का जवाब मुझसे माँगा जाता है. जब कोई गजेन्द्र सिंह जंतर-मंतर पर फाँसी लगा लेता है तो मुझसे पूछा जाता है कि मैंने कैमरा छोड़ उसे बचाया क्यों नहीं? यह सवाल मुझसे बड़ी बेशर्मी के साथ वही लोग पूछ रहे होते है जो वहाँ किसी पार्टी के कार्यकर्ता या पुलिस वाले के रूप मे खड़े होते हैं. वोट आप देते हो, चुनते नेता को है तो समस्याओं का हल मुझसे क्यों? जब सारे काम मुझे ही करने है तो आप है ही क्यों? जब सारी परंपरा और लोग शिथिल हो चले है तो लोकतंत्र, व्यवस्था और चुनाव का इतना बड़ा ड्रामा क्यों?

सच कहूँ तो लोकतंत्र के असली गुनहगार आप ही हैँ. बस अपनी कायरता थोपने के लिए आपको कोई कमजोर चाहिए होता है. और मुझसे कमजोर आपको कौन मिलेगा? आप जाति, धर्म, परिवार के नाम पर दंगाई, बलात्कारियों, गुंड़ो को वोट देते है. वो घोटाले करते है आप चुप रहते हैं, वो गुंड़ई करते है आप चुप रहते है. किसान मरता है आप चुप रहते है, मजदूर मरता है आप चुप रहते है. ईमानदार अफसर कुचले जाते है आप चुप रहते है, मैं जलाया जाता हूँ आप चुप रहते हैँ. और आपकी बारी आती है तो आप रोते है. लोकतंत्र, मीडिया, अधिकार आपको सब याद आते है. खुद से कभी पूछा है कभी कहाँ होते है आप जब दलित महिलाओं से बलात्कार होता है? कहाँ होते है आप जब आदिवासियों के घर, जंगल और जमीन छीने जाते है? शायद सेल्फी ले रहे होते है उस रेस्टोरेन्ट में जहाँ किसी बच्चे से मजदूरी कराई जाती है. मुझे समस्या इस बात से नही कि आप चुप रहते है. मुझे समस्या इस बात से कि आप सबकुछ जानकर भी चुप रहते है. मुझे कभी भी आप से बात करते हुए यह नही लगा कि आपको कुछ नही पता होता.

आप बस कुछ न पता होने का ढ़ोग करते है ताकि मुझ पर आरोप लगा सके कि मैंने आपको कुछ बताया नहीं. मुझे तो आपसे ही पता चलता है कि नेता चोर है, बेईमान है, दंगाई है. पर जब उन्ही नेताओं को संसद और विधानसभाओं में बार-बार चुनकर आते हुए देखता हूँ तो मुझे यकीन हो जाता है कि आप पक्के दोमुंहे है, कायर है. बार-बार गलती करने वाले को गुनहगार कहा जाता है और आप भी गुनहगार है, लोकतंत्र के असली गुनहगार है. आप इन सम्मानित नेताओं को इसलिए चुन कर नहीं भेजते है कि आप अज्ञानी है, अबोध है. दरअसल आप ही दंगाई है, गुंडे है. क्या आप वो नहीं है जो दंगों मे हिन्दू और मुस्लिम मे बँट जाते है? सोशल मीडिया पर भर-भर कर गाली देने वाले भी आप ही होते है न. क्या आप वो नहीं है जो दलितों का शोषण करता है? क्या आप वो भी नहीं है जो गरीबों और मजदूरों का शोषण करता है?

क्या आपको वाकई हक है कि आप मुझसे सवाल कर सके? पर मैं फिर भी आपके आरोपों को झेलता हूँ क्योंकि मैं is equal to करने पर विश्वास नही रखता. मैं सफाई नही दे रहा. मैं बस आपको समझा रहा हूँ कि अपनी असफलताओं को मुझ पर मत थोपिए. पर चुप भी मत रहिए, कुछ बोलिए आपकी चुप्पी आने वाली पीढ़ियों को खामोश करेगी. मेरे अंदर भी काफी कुछ गलत है, इसलिए मेरे खिलाफ भी बोलिए. पर केवल मेरे खिलाफ ही मत बोलिए. जो भी गलत है उसके खिलाफ बोलिए. कभी-कभी अपने खिलाफ भी बोलिए. चंद लोगों को भ्रम हो चला है कि आप गूँगे है इसलिए चुप मत रहिए, बोलिए जनाब. जिस दिन आप बोलेंगे मुझे बोलने की जरूरत नहीं पड़ेगी. मैं तो बोलता हूँ क्योंकि आप नहीं बोलते. मैं आपके हाथों मे श्रध्दाँजलि और सांत्वना की मोमबत्ती नहीं आक्रोश की मशाल देखना चाहता हूँ. मैं जानता हूँ और मानता भी हूँ कि हम में कोई क्रांतिकारी नहीं है. पर अब समय आ गया कि हम विद्रोह करे. व्यवस्था से नही तो खुद से ही करे. एक बार बगावत करके तो देखिए, बगावत से प्यार न हो जाए कहिएगा. बगावत ही लोकतंत्र का असली स्वरूप है. और अगर आप ऐसा नहीं करें तो आप गुनहगार होंगे. लोकतंत्र के गुनहगार, आने वाली पीढ़ियों के गुनहगार.

The Battle of ‘Bihar’

Bihar is all set to vote and this election seems to be a tough battle for Nitish, Lalu and Modi. The politics in Bihar has always been woven around caste although PM said that development would be the agenda for this election.

At this point of time not only Bihar but the entire country is witnessing a topsy turvy situation with the odour of communalism spell all over. The beef politics has escalated to such a level that every eminent politician has spoken about it.

The Dadri or the Mainpuri incidents are deeply affecting the mind of Bihari Muslims. Both the incidents have definitely affected the psyche of a muslim voter. The community as a minority feels insecure of the government. The incidents in UP side by side are also paving way to communalism in the state which will go to polls in 2017.

Experts on one hand believe that BJP is trying to bring a communal colour to this election and has very successfully tilted the agenda also. Many believe that the elections could have been fought without using the Hindu- Muslim card. The silence of PM on this issue is again supporting the claim strongly.

On the other hand Nitish Kumar has been successful in averting any such issue in Bihar. Through the statements over #Beef parties are trying to show their support either for or against it. BJP has clearly stated that if voted to power it would take strict measures to stop cow slaughter, a move to gain Hindu vote base.

Many though believe that by inciting anti-muslim feelings through politics over Beef certain parties are trying to portray BJP as a staunch right wing party. The anti- BJP propaganda gets supported by the very BJP ideology of its being a right wing party and Modi has tried hard but  has not been successful yet in washing the 2002 riots stain.

The Battle for Bihar will continue and the parties will keep playing the blame game but the truth is the voter today is much aware of right or wrong. Such incidents should not deter anyone irrespective of caste or religion to make a right choice.

The Big fight or The Khan Fight?

Bollywood will enter 2016 with a big bang! The industry is all set to bring best releases to their fans. For those who wish to see three Khans together here is a little relief to them. Although not in the same movie but releasing the movie at the same time may add thrill in theatres. Raees Vs Sultan Vs Dangal, maybe I can play with these words and make it Sultan Vs Raees in Dangal!

Salman Khan’s Sultan first look is out, not so long ago we saw Aamir Khan give us a sneak peek at Dangal and not forgetting the charm of the glance of Shahrukh Khan’s Raees. Adding on to the common things of Khans is the glimpse of their first look. All three of the movies have their close up shot of faces, with bold and harsh attitude.

These three big releases are going to create lots of tussles not only in their movies but also in the minds of fans, so as to who look better as a wrestler, either Salman or Aamir. With so much heat building up on the personal front, we’re sure that there will be more in the coming days as they take on each other on the silver screen. Vote now for which film’s first look is more attracting. Make your choice, I toh literally Khan (can’t) say which one will I choose first!

Know India-SA highlights Sir Jadeja style

Ravindra Jadeja, commonly known as Sir Ravindra Jadeja is a man with bags full of sarcasm and jokes, whose tweets every eye must have passed through. Hang on a bit, here I am talking about tweets from a parody account named after him. The twitter handle with the name @SirJadeja has some of the best sarcastic tweets after KRK’s profile. He has his own way to tell a story, let’s have a look how Sir Jadeja (parody account) expressed his emotions on India’s dismal batting performance against South Africa into the Barabati Stadium, Cuttack during the second Twenty20 international.

His first tweet in this match started in full swing with Rohit Sharma, when India was almost collapsing and South Africa was chasing the winner trophy. And finally that moment came where Indian team very cordially gave an invitation to their audience’s who could raise fingers on them.

This post of him is weird and kind of ‘wanna be’ who want to go back to the team. But let me remind him that jo hota acche ke liye hota. At least he has the opportunity to tweet about the loss of the team. India rolled out in just 17.2 overs, to record their second-lowest total in T20 internationals, after being defeated at 74 runs only by Australia at the Melbourne Cricket Ground in February 008.

But as soon as the match turned out to be India’s failure, fans vented their fury by throwing water bottles from the galleries. What to say about the government rule, Odisha has banned the use of small bottles but not the big bottles unlike other states (as reported in HT).

Then suddenly that awkward moment came when there were bottles all around leaving no injuries to the players. Sir Jadeja in his sarcastic way tweeted this and even compared the situation with our beloved Pakistan opponents.

SirJadeja even tried to stop this instigating bottle violence but could not help it out instead came to a conclusion that may be the spectators were Modi supporter or ask Dhoni to look for better options to survive on the field.

After this tousled match between India and South Africa it was the time to raise questions on the captaincy of India, like it happens whenever India losses. But this time it was more aggressive because SA won the match by 6 wickets and 672 bottles (Pun Intended). Now it was the turn of Dhoni, who came to the picture, but being a cricketer SirJadeja has a full respect for his country and his co-cricketers. His later tweets were full with providing supports and giving cheers to the Indian team. After all, this is a game in which winning and losing is the part and parcel of life.