A game that takes away life – Blue Whale Challenge

Is it Gaming or Murdering

A game that takes away life! A game that asks people to commit suicide! Why is it called a game, why not a murder attack? ‘Blue Whale Challenge’ the horrifyingly dangerous game that has taken at least 130 teen deaths across Russia. It is a 50-day challenge in which the administrator gives a certain task to the member to adhere to. But mind it! tasks are like horrific ones that include harming oneself, watching horror movies in the late night, waking up at unusual hours. Gradually getting more extreme like carving a specific phrase on the person’s own hand, poking a needle in the arm or leg or as dreadful as a whale.

When was it started

Originating in the year 2013, in Russia with “F57”, one of the names of the then-called “death group” of the Vkontakte (largest European online social networking service, like Facebook). Allegedly causing first suicide in 2015. Since then it has become a trend and many teenagers are getting accused of it.

Why again it is in news

Now, recently not only in Russia and UK but in India also it is believed to have taken the shape. A 14-year-old boy from Andheri, Mumbai, committed suicide and has carved a fish on his arm with a needle. His mobile phone is with the state forensic science laboratory and investigations are going on so as to find out if there was any link with the group of ‘Blue Whale challenge.’ As reported in HT, “No link so far between Mumbai teen’s suicide, Blue Whale challenge,” said Police.

But the question is why people are so harsh and what is making them take up such challenge- Is it the trend or the competition that is compelling the teenagers into killing themselves.

Police are warning people to stop doing this cruel activity with their body. Also, social platforms have taken a step ahead to stop this challenge, like Instagram has started showing users a warning when they search for pictures relating to Blue Whale. We should also look beside us and find out if any unwanted activity is happening with our friends. DustbinDubba urges you to ‘Take a challenge to stop Blue Whale Challenge!’

#StopBlueWhaleChallenge

regalCinema DuctbinDubba

No more ‘Regal’ feel for Delhites

The four walls covered hall, succumbed around the buildings at Connaught Place- Regal Cinema is now putting its shutters down today, i.e., 30th March. One of the most iconic single screen theatre in Delhi will not give you the experience of buying low-cost fares or booking tickets of balcony and box. You won’t be surprised to know that its been 85 years since its being. The decision to close the doors is to give the theatre a makeover and make it a multiplex just like others in town.

Before the movies were screened, there were plays done to entertain the audience. No doubt it is a heritage landmark, which was given the shape by its English architect Walter Sykes George. Therefore we can see those curves and British times interior designs. But whatever new look it may take the feel of the interiors will never get away from our heart. We are sure there are many like us whose first reaction will be whoa!!! when they hear the news.

There are memories attached to it; thankfully we got the opportunity four days back to watch last movie Phillauri there. Although the film was shocking but the adventure to watch it in Regal with friends during the month end (cash-crunch) was an awesome feeling. It is heard that they are ending the show by screening “Mera Naam Joker.” So guys, hurry up… go… and get the Regal feel because tomorrow may never come.

Critical review of Being Indian video

It’s a typical mindset that when you hear ‘I am from Bihar’ you get replies like Haan I knew, aapke bolne ke style se lag rha tha that you are from Bihar. Or the other very patent answer is ohho Lalu ke sheher se ho? In the current scenario, you might have also got answers that, who will win in this Bihar election?

This is not what Bihar is all about. It is far more than IAS, Lalu Prasad, Litti Chokha, HUM, etc. Guys grow up! This is what a video uploaded on Being Indian depicts to its lovely Biharis.  Here, in my opinion I don’t think the video is doing justice to Biharis. Every state is typical in its own way like Punjabis, Bengalies, South Indians then why jokes are found more on Biharis. After some time, the video has exaggerated on the conditions of Bihar.

I don’t think they played well with the comic part, they tried a lot to be funny, but they weren’t much. The issues that they have raised for Bihar are not the only copyright of Bihar, the same issues are found in UP, MP, in fact, India as large. Don’t you think corruption, kidnapping, murder are evils that have copyright of India on them? Maybe the video tickles a bit but do not need a huge clap. I appreciate the theme and working of the actors, but had it been funnier without touching the emotions of Bihar, it would have succeeded in the race of viral videos. If you don’t agree with me have a look at it once keeping my points in mind.

 

 

जाने-अंजाने में मोदी सरकार कहीं नॉन वेज को बढ़ावा तो नहीं दे रही

‘अच्छे दिन आने वाले हैं’…आपको मोदी सरकार का ये वादा तो याद ही होगा! लेकिन जो हालात हैं उन्हें देखकर सबकुछ उल्टा-पुल्टा सा लगता है. देश के तमिलनाडू और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में हालात ये हैं कि एक आबादी ने तो दाल छोड़कर मुर्गी और अंडा खान चालू कर दिया है. वहीं चुनाव के दौर से गुज़र रहे बिहार के लोगों ने बताया कि उन्होंने तो चावल के साथ दाल की जगह चटनी को सहारा बना लिया है. वोटर्स के एक तबक के कहना है कि वो यह नहीं समझ पा रहे कि दाल की बढ़ी कीमतें चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बन पाईं.

दिल्ली में अरहर दाल 180 रुपए किलो बिक रही है. वहीं चिकन की कीमत 130 रुपए किलो है. आप दाम में फर्क खुद कर लीजिए. बाकी की दालें भी 100 रुपए से महंगी बिक रही हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि जल्द ही दाल की कीमतें 200 के पार चली जाएंगी. साल 2013 में एक रिपोर्ट में ये तो ज़रूर बता दिया गया कि लोगों के गुज़ारे के लिए 32 रुपए रोज़ाना की रकम काफी हैं लेकिन इस बात पर रौशनी कौन डालेगा कि 180 रुपए किलो की दाल में 25 रुपए रोज़ाना का गणित कैसे बैठेगा.

ब्राहम्ण-बनियों की सरकार मानी जाने वाली बीजेपी के नेता एक तरफ तो बीफ बैन का विरोध कर रहें हैं वहीं सरकार जाने-अंजाने में नॉन वेज को बढ़ावा दे रही है. लेकिन इन सब में वो तबका हमेशा ठगा सा महसूस कर रहा है जिसे अच्छे दिन के सपने दिखाए जाते हैं. बिहार चुनाव में एक बार फिर से जाति और धर्म मुख्य मुद्दा बन गए हैं. वोटर्स से बात करने पर गाय पर हो रही राजनीति सतह पर आ जाती है लेकिन 8 नंबवर को जब विधानसभा चुनाव के नतीजे आ जाएंगे और अगले पांच साल के लिए सरकार तय हो जाएगी तब कोई गाय की बात नहीं करेगा और महंगाई जस की तस बनी रहेगी. वोटर एक बार फिर थोड़ा उनकी वजह से और थोड़ा खुद की वजह से ठगा जाएगा और अच्छें दिनों के इंतजार में ये सरकार भी बीते जाएगी और पाले आएगा कोई नया जुमला!

कुलकर्णी पर फेंकी गई स्याही को तेज़ाब बनते देर नहीं लगेगी

साल 2011 में पाकिस्तान के पंजाब सूबे के तत्कालीन गवर्नर सलमान तासीर के कत्ल की ख़बर ने पाकिस्तानियों के साथ बाकी दुनिया को भी सकते में डाल दिया था. तब शायद ही किसी को गुमान हुआ कि ये ऐसे घटनाएं भारत में भी घटने लग जाएंगी. दरअसल, सलमान तासीर को उनके दो बॉडी गार्ड्स ने इसलिए मौत के घाट उतार दिया था क्योंकि वे पाकिस्तान के ईशनिंदा (पैगंबर मोहमम्द आलोचना) के तत्कालीन कानून से इत्तेफाक नहीं रखते थे. सलमान तासीर अपने ही मज़हब में मौजूद कमज़ोरियों के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई में मार दिए गए. वे मुसलमान थे,पाकिस्तानी थी, ऊंचे ओहदे पर विराजमान थे, लेकिन धर्म के उन्माद ने उनकी जान ले ली.

अब आज के भारत में लौटते हैं. सुधींद्र कुलकर्णी पर शिवसेना वालों ने इसलिए स्याही फेंक दी क्योंकि वे पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शिद महमूद कसूरी की किताब के लॉन्च के प्रमुख आयोजक थे. कुलकर्णी बीजेपी के लौहपुरुष अडवाणी के मीडिया सलाहकार रहे हैं. जब इस दौर का इतिहास लिखा जाएगा तब अडवाणी का नाम भारत के विराट हिंदुओं में लिखा जाएगा. उनका नाम शायद बाला ठाकरे जैसे विराट हिंदू से तो  ऊपर ही होगा. कुलकर्णी हिंदू हैं,भारतीय भी हैं. अडवाणी जैसे विराट हिंदू के सलाहकार भी रहे हैं,लेकिन इन सबके बावजूद उन्हें बख्शा नहीं गया. कुलकर्णी के मुंह पर स्याही फेंककर शिवसेना ने खुद को ज़्यादा हिंदू और ज़्यादा भारतीय साबित कर दिया. ठीक वैसे ही जैसे सलमान तासीर के हत्यारों ने उनकी हत्या करके खुद को ज़्यादा मुसलमान, बड़ा मुसलमान साबित किया था.

साल 2014 में पाकिस्तान के शहर पेशावर में एक आर्मी स्कूल पर आतंकी हमला हुआ, इसमें 145 लोगों की हत्या हुई, जिनमें ज़्यादातर छोटे-छोटे मासूम स्कूली बच्चे थे. हमले करने वाले किसी दूसरे देश से नहीं आए थे, बल्कि पाकिस्तान सरकार के जरिए पाले गए सगे आतंकवादी थे. पाकिस्तान इस्लाम, भारत विरोध और कश्मीर के नाम पर इन्हें सालों से पालता आया है. आज इनके पालतू इन्हें ही नोच रहे हैं.

पिछले कई महीनों से भारत भी पाकिस्तान हो चला है. अगर आप इसी तरह बर्दाश्त करते रहे तो आपको पता भी नहीं चलगा कि स्याही कब तेज़ाब बन गई. आप पाकिस्तान और उन जैसे धर्म के उन्माद से भरे देशों की हालत देख सकते हैं. किसी की नफरत को आधार बनाकर पलने वाला देश पाकिस्तान हो जाता है. अब हमें ये तय करना होगा कि सालों से धार्मिक भाईचारे की परंपरा के बूते टिके रहने वाली धरती को उसी ढर्रे पर बरकरार रखना है या आतंकवादियों और दहशतगर्दों को सौंप देना है?

सलमान तासीर के तर्ज पर हम पहले से ही कलबुर्गी, पनसारे और दाभोलकर को खो चुके हैं, अगर ऐसी ही गुंडई जारी रही तो कल गए ये आंतकी हमारे बच्चों के स्कूलों पर भी हमला करने लगेंगे. हमें इनका जमकर सामना करना पड़ेगा…समाज के लिए, देश के लिए,मानवता के लिए और अपने बच्चों के भाविष्य और उनकी जान के लिए!

एक पत्रकार का समाज को खुला खत!

राजनीति की कड़िया सुलझाते-सुलझाते अब मैं खुद में ही उलझने लगा हूँ, अपने अस्तित्व पर ही सवाल करने लगा हूँ. समझ नहीं पाता मैं क्या हूँ? क्या मैं दलाल हूँ, वेश्या हूँ या फिर न्यूज ट्रेडर हूँ? क्या मैं सचमुच प्रेस्टीट्यूड हूँ? क्या मैं वो नहीं हूँ जो रोजाना गलियों में पिटता है, कभी निर्भया तो कभी गुडिया के लाठी खाता है? क्या मैं वो नही हूँ जो कभी शाहजहाँबाद तो कभी बलघाट में जलाया जाता हैं? क्या मैं वो नही हूँ जो कभी आपातकाल तो कभी दंगों में उन लोगों के लिए खड़ा होता हूँ जो कभी मेरे लिए खड़े नहीं हुए? इन सिक्के के दो पहलुओं से मिलकर ही तो मैं बनता हूँ. मुझसे ओब्जेक्टिविटी की आशा करने वाले बुध्दजीवी हमेशा मेरे लिए दलाल और प्रेस्टीट्यूड जैसे विशेषणों का ही इस्तेमाल करते हैं. उन्हें मैं नेताओं के घर आते जाते तो दिखता हूँ पर देश के पाँच सबसे गरीब जिलों में भटकते हुए नहीं. क्या वो मेरे सिक्के के सिर्फ एक पहलू को नहीं देखते हैं?

लोग मेरे सामने खड़े होकर ही मुझे गाली देते हैं. मेरी विश्वसनीयता पर सवाल करते हैं. अच्छा है कि बोलते है, सवाल करते है, मुझसे डरते नहीं. कभी सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ बोलकर देखिए. गालियों से आपकी बोलती बंद न कर दी जाये तो कहना. आप 19(a) से लेकर 66(a) सब भूल न जाए तो कहना. लेकिन मैं फिर भी लिखता हूँ हर रोज लिखता हूँ. क्यों लिखता हूँ? किसके लिए लिखता हूँ? मैं लिखता हूँ क्योंकि मुझे परवाह हैं आपकी. मैं चुप हो गया तो आवाज आपकी बंद होगी. कोई शक हो तो सोच कर देखिए कि जिन लोगों की आवाज मैं नहीं उठाता क्यों उनकी आवाज दब कर रह जाती हैं? गुड़गाँव, सूरत और दिल्ली की मजदूर बस्तियों में गुलामों की तरह रहने वाले मजदूर तभी चर्चा में क्यों आते हैं जब मैं वहाँ जाता हूँ? आपके चुने हुए प्रतिनिधियों के सामने आपका प्रतिनिधित्व मैं करता हूँ. आप मुझे चुनते नहीं,वोट नहीं देते. मुझे 6 रुपये में खाने की थाली नहीं मिलती, रहने को सरकारी घर नहीं मिलता. फिर मैं क्यों करता हूँ ये सब आपके लिए, उनके लिए जिनके लिए मैं महज एक दलाल हूँ, सत्ता और कॉरपोरेट का दलाल? मैं सरकार बना सकता हूँ, गिरा नहीं सकता. मैं मोदी और केजरीवाल बना सकता हूँ, उनसे काम नहीं करा सकता. मैं ताकतवर की तरफ होने पर ताकतवर होता हूँ कमजोर की तरफ होने पर कमजोर होता हूँ. लेकिन मैं कमजोर नहीं हूँ. मैं देश के प्रधानमंत्री की भी आँखों में आँख ड़ाल सवाल कर सकता हूँ. कमजोर आप हैं क्योंकि आप सवाल नहीं करते. नेताओं को पता है कि मैं कितनी भी मजबूती से आपके लिए खडा रहूँ आप को चुनना उसी को है. आपकी यही कमजोरी मुझे कमजोर करती हैं.

फिर भी मैं आपके सवालों पर, आरोपों पर चुप रह जाता हूँ. इसलिए नहीं की मैं सचमुच दलाल हूँ बल्कि इसलिए कि मैं खुद मे ही उलझने लगा हूँ खुद से ही सवाल करने लगा हूँ. मेरे अंदर भी एक द्वंद है क्योंकि मैं यहाँ कुछ बदलने आया था. पर मुझे हर पल सीख दी गई कि मैं कोई समाज सेवक नहीं हूँ, क्राँतिकारी नहीं हूँ. मेरी नैतिकताओं से मुझे ही बंधक बना दिया गया. और शायद धीरे-धीरे मैंने भी समझौता कर लिया. और करूँ भी क्यूँ न? सारी बगावत मैं ही नहीं करुंगा. कुछ जिम्मेदारी आपकी भी बनती है. फिर भी मेरी आत्मा मेरे शरीर से हर रोज सवाल करती है, बगावत करती है. मैं मरता भले ही न हूँ पर खुद मे ही घुटता जरूर हूँ. मुझे अपने ही आदर्शों और उम्मीदों की अर्थी का बोझ उठा कर चलना होता हैं. शायद इसलिए मैं आपके सवालों का जवाब नहीं दे पाता और जवाब भी क्यूँ और किसके लिए? उन नपुंसक लोगों के लिए जो अपनी असफलताओं को हमेशा मेरे ऊपर थोप देते हैं. सारी समस्याओं का जवाब मुझसे माँगा जाता है. जब कोई गजेन्द्र सिंह जंतर-मंतर पर फाँसी लगा लेता है तो मुझसे पूछा जाता है कि मैंने कैमरा छोड़ उसे बचाया क्यों नहीं? यह सवाल मुझसे बड़ी बेशर्मी के साथ वही लोग पूछ रहे होते है जो वहाँ किसी पार्टी के कार्यकर्ता या पुलिस वाले के रूप मे खड़े होते हैं. वोट आप देते हो, चुनते नेता को है तो समस्याओं का हल मुझसे क्यों? जब सारे काम मुझे ही करने है तो आप है ही क्यों? जब सारी परंपरा और लोग शिथिल हो चले है तो लोकतंत्र, व्यवस्था और चुनाव का इतना बड़ा ड्रामा क्यों?

सच कहूँ तो लोकतंत्र के असली गुनहगार आप ही हैँ. बस अपनी कायरता थोपने के लिए आपको कोई कमजोर चाहिए होता है. और मुझसे कमजोर आपको कौन मिलेगा? आप जाति, धर्म, परिवार के नाम पर दंगाई, बलात्कारियों, गुंड़ो को वोट देते है. वो घोटाले करते है आप चुप रहते हैं, वो गुंड़ई करते है आप चुप रहते है. किसान मरता है आप चुप रहते है, मजदूर मरता है आप चुप रहते है. ईमानदार अफसर कुचले जाते है आप चुप रहते है, मैं जलाया जाता हूँ आप चुप रहते हैँ. और आपकी बारी आती है तो आप रोते है. लोकतंत्र, मीडिया, अधिकार आपको सब याद आते है. खुद से कभी पूछा है कभी कहाँ होते है आप जब दलित महिलाओं से बलात्कार होता है? कहाँ होते है आप जब आदिवासियों के घर, जंगल और जमीन छीने जाते है? शायद सेल्फी ले रहे होते है उस रेस्टोरेन्ट में जहाँ किसी बच्चे से मजदूरी कराई जाती है. मुझे समस्या इस बात से नही कि आप चुप रहते है. मुझे समस्या इस बात से कि आप सबकुछ जानकर भी चुप रहते है. मुझे कभी भी आप से बात करते हुए यह नही लगा कि आपको कुछ नही पता होता.

आप बस कुछ न पता होने का ढ़ोग करते है ताकि मुझ पर आरोप लगा सके कि मैंने आपको कुछ बताया नहीं. मुझे तो आपसे ही पता चलता है कि नेता चोर है, बेईमान है, दंगाई है. पर जब उन्ही नेताओं को संसद और विधानसभाओं में बार-बार चुनकर आते हुए देखता हूँ तो मुझे यकीन हो जाता है कि आप पक्के दोमुंहे है, कायर है. बार-बार गलती करने वाले को गुनहगार कहा जाता है और आप भी गुनहगार है, लोकतंत्र के असली गुनहगार है. आप इन सम्मानित नेताओं को इसलिए चुन कर नहीं भेजते है कि आप अज्ञानी है, अबोध है. दरअसल आप ही दंगाई है, गुंडे है. क्या आप वो नहीं है जो दंगों मे हिन्दू और मुस्लिम मे बँट जाते है? सोशल मीडिया पर भर-भर कर गाली देने वाले भी आप ही होते है न. क्या आप वो नहीं है जो दलितों का शोषण करता है? क्या आप वो भी नहीं है जो गरीबों और मजदूरों का शोषण करता है?

क्या आपको वाकई हक है कि आप मुझसे सवाल कर सके? पर मैं फिर भी आपके आरोपों को झेलता हूँ क्योंकि मैं is equal to करने पर विश्वास नही रखता. मैं सफाई नही दे रहा. मैं बस आपको समझा रहा हूँ कि अपनी असफलताओं को मुझ पर मत थोपिए. पर चुप भी मत रहिए, कुछ बोलिए आपकी चुप्पी आने वाली पीढ़ियों को खामोश करेगी. मेरे अंदर भी काफी कुछ गलत है, इसलिए मेरे खिलाफ भी बोलिए. पर केवल मेरे खिलाफ ही मत बोलिए. जो भी गलत है उसके खिलाफ बोलिए. कभी-कभी अपने खिलाफ भी बोलिए. चंद लोगों को भ्रम हो चला है कि आप गूँगे है इसलिए चुप मत रहिए, बोलिए जनाब. जिस दिन आप बोलेंगे मुझे बोलने की जरूरत नहीं पड़ेगी. मैं तो बोलता हूँ क्योंकि आप नहीं बोलते. मैं आपके हाथों मे श्रध्दाँजलि और सांत्वना की मोमबत्ती नहीं आक्रोश की मशाल देखना चाहता हूँ. मैं जानता हूँ और मानता भी हूँ कि हम में कोई क्रांतिकारी नहीं है. पर अब समय आ गया कि हम विद्रोह करे. व्यवस्था से नही तो खुद से ही करे. एक बार बगावत करके तो देखिए, बगावत से प्यार न हो जाए कहिएगा. बगावत ही लोकतंत्र का असली स्वरूप है. और अगर आप ऐसा नहीं करें तो आप गुनहगार होंगे. लोकतंत्र के गुनहगार, आने वाली पीढ़ियों के गुनहगार.

The Battle of ‘Bihar’

Bihar is all set to vote and this election seems to be a tough battle for Nitish, Lalu and Modi. The politics in Bihar has always been woven around caste although PM said that development would be the agenda for this election.

At this point of time not only Bihar but the entire country is witnessing a topsy turvy situation with the odour of communalism spell all over. The beef politics has escalated to such a level that every eminent politician has spoken about it.

The Dadri or the Mainpuri incidents are deeply affecting the mind of Bihari Muslims. Both the incidents have definitely affected the psyche of a muslim voter. The community as a minority feels insecure of the government. The incidents in UP side by side are also paving way to communalism in the state which will go to polls in 2017.

Experts on one hand believe that BJP is trying to bring a communal colour to this election and has very successfully tilted the agenda also. Many believe that the elections could have been fought without using the Hindu- Muslim card. The silence of PM on this issue is again supporting the claim strongly.

On the other hand Nitish Kumar has been successful in averting any such issue in Bihar. Through the statements over #Beef parties are trying to show their support either for or against it. BJP has clearly stated that if voted to power it would take strict measures to stop cow slaughter, a move to gain Hindu vote base.

Many though believe that by inciting anti-muslim feelings through politics over Beef certain parties are trying to portray BJP as a staunch right wing party. The anti- BJP propaganda gets supported by the very BJP ideology of its being a right wing party and Modi has tried hard but  has not been successful yet in washing the 2002 riots stain.

The Battle for Bihar will continue and the parties will keep playing the blame game but the truth is the voter today is much aware of right or wrong. Such incidents should not deter anyone irrespective of caste or religion to make a right choice.

Eve teasing, the latest trend of public stunt

“Before you judge make sure you are perfect,” this quote goes so true with the recent controversy of Jasleen Kaur, Traffic controller, later on said to be a political volunteer who accused a boy in eve teasing case in Delhi last week.

This incident took many turns just like those usually acquired by Mr. Kejriwal, also the proofs about her being an AAP volunteer are wishy-washy. But what Sunny (name changed, accused) claimed that she is playing tantrums just to publicise herself and take more points on her being a ‘Woman’.

Our country is aware of the status women have earned irrespective of cases hurting their sentiments by the male dominant society. Mostly boys are the target group because of their inbuilt talent of egoism, but sometime they may not be the only suspect. We are not confirming that Sunny has not done any mistake, or the entire fault is that of Jasleen, but what is revealed by witness and portrayed by media tells a different story.

Indian Express has exposed a video of his correspondent sharing the real story of the incident with the byte from the accused and the eye-witness who is firm on his statement that it was just a discussion not an eve teasing case. If you have missed the video have a look!

Another video which is trending by the name of #Shameontimesnow The way ethics of Journalism is going, has to be taken care of. Journalism means to find the truth based on balence not to allege someone. In this video, the reporter is telling the boy that “Badtameezi aapne ki hai” (you have been the one who has done inappropriate thing). She has given least chances to the boy to reply.

Thus, the case has many legs yet with no conclusion. So, finally we can go back to the first line of our article which reminds about judging the person before being judgemental on any issue.

“Fortis Healthcare” – This is indeed very shameful

Recently I have been coming across so many incidents against this hospital and to my shock beingsuch a famous brand when it comes to health care it doesn’t even react to the allegations. May be it still hasn’t realized the power of social media yet.Recently a car driver Sandeep in Delhi lost his 17 day old child on the night of 22nd Aug, 2015. The infant was in Fortis Hospital Vasant Kunj hospital for barely 10 minutes before he breathed his last. The hospital ran up a bill of Rs 20,000 and refused to release the body unless the amount was paid in full.  

The poor man when called up his owner for intervention the man could finally go with his son’s dead body only the next morning, having spent 18,000, which was paid during admission. When the owner himself intervened he was met with more aggression. He then took out his phone and began recording, all the while, continuing to ask them about the rules under which they can detain a body with them like that. At this, the staff members snatched away his phone, demanding that he should delete the video if he wants it back. For the record, Fortis is still holding on to his phone. All this transpired at the hospital’s reception, in the clear view of CCTV cameras.

A slight look at this forum http://www.consumercomplaints.in/fortis-healthcare-b100262 would actually list out how the system of Fortis Healthcare actually works. And this just one of the many websites which have similar content and complaints. Forget about their website just check out their Facebook page wherein people have posted their experience. Its more saddening that police complaints are also not taken care of. Doctors are considered as gods in our country but as the series of events unfolds it shows quite a opposite picture. Isn’t it?

Will Pakistan yet again be proven wrong?

[box]By Samridhi Dikshit [/box]

DI

Courtesy Hindustan Times

The leader of the D-Company is sleeping in Karachi. This is what has been revealed by an Indian news channel. But after so many evidences still Pakistan is refusing of giving shelter to Dawood Ibrahim, (we all are aware of his designation).

The person who wants to know everything keeping Nation at his stake has again created a buzz by breaking the news about the current location of Dawood Ibrahim. Times Now reporters traced the phone number and called Ibrahim’s wife, Mehjabeen Shaikh in Karachi and asked whether she was indeed his wife Mehjabeen Shaikh. After an affirmative reply she said Ibrahim was asleep.

On questioning about evidences, Defence expert Major General (retd.) S.R. Sinho nicknamed Pakistan as “liar”. Giving them the proof about the photographs of underworld don Dawood Ibrahim published in Hindustan Times recently. Earlier, many times Pakistan’s Ministers like Musharraf refused of Dawood’s stay in Pakistan. But the current phone call conversation also, cannot be ignored. The agencies also have documents that show that Dawood’s family members travelled between Pakistan and Dubai. They also have images of Dawood’s Pakistani passport. And many other evidences like the some from the list of 15 houses owned by Dawood are based in Karachi.

Pakistan’s Attorney is in big danger now as the fingers are raised on them again and again. We have been witnessed the same kind of situation at the time of Osama Bin Laden who was residing near Army headquarters. Similarly, in spite of all the evidence given by India, Pakistan denied having any facts against Hafeez Sayeed and Lakhvi.

While the trail of proofs goes on between Pakistan’s rulers who for the past two decades denied the presence of the heads of crime syndicate, Indian security agencies say that the D-company reaches across the border into India for its extortion activities. This denial issue will only meet its end if we are able to prove our point which can only happen when Dawood Ibrahim is caught red handed in Pakistan.