Post terribly tiny tales, time for #6WordStory

By the term, it is clear that terribly tiny tales are the shortest form of story telling but here are some guys who have brought stories to just 6 words. And when you read ’em, you find that they are complete in their sense. In the age of the internet when the expression has become limited to 140 characters…you can for sure cherish these shortest form of stories. So, here they are and they are by WHATASHORT…

जाने-अंजाने में मोदी सरकार कहीं नॉन वेज को बढ़ावा तो नहीं दे रही

‘अच्छे दिन आने वाले हैं’…आपको मोदी सरकार का ये वादा तो याद ही होगा! लेकिन जो हालात हैं उन्हें देखकर सबकुछ उल्टा-पुल्टा सा लगता है. देश के तमिलनाडू और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में हालात ये हैं कि एक आबादी ने तो दाल छोड़कर मुर्गी और अंडा खान चालू कर दिया है. वहीं चुनाव के दौर से गुज़र रहे बिहार के लोगों ने बताया कि उन्होंने तो चावल के साथ दाल की जगह चटनी को सहारा बना लिया है. वोटर्स के एक तबक के कहना है कि वो यह नहीं समझ पा रहे कि दाल की बढ़ी कीमतें चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बन पाईं.

दिल्ली में अरहर दाल 180 रुपए किलो बिक रही है. वहीं चिकन की कीमत 130 रुपए किलो है. आप दाम में फर्क खुद कर लीजिए. बाकी की दालें भी 100 रुपए से महंगी बिक रही हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि जल्द ही दाल की कीमतें 200 के पार चली जाएंगी. साल 2013 में एक रिपोर्ट में ये तो ज़रूर बता दिया गया कि लोगों के गुज़ारे के लिए 32 रुपए रोज़ाना की रकम काफी हैं लेकिन इस बात पर रौशनी कौन डालेगा कि 180 रुपए किलो की दाल में 25 रुपए रोज़ाना का गणित कैसे बैठेगा.

ब्राहम्ण-बनियों की सरकार मानी जाने वाली बीजेपी के नेता एक तरफ तो बीफ बैन का विरोध कर रहें हैं वहीं सरकार जाने-अंजाने में नॉन वेज को बढ़ावा दे रही है. लेकिन इन सब में वो तबका हमेशा ठगा सा महसूस कर रहा है जिसे अच्छे दिन के सपने दिखाए जाते हैं. बिहार चुनाव में एक बार फिर से जाति और धर्म मुख्य मुद्दा बन गए हैं. वोटर्स से बात करने पर गाय पर हो रही राजनीति सतह पर आ जाती है लेकिन 8 नंबवर को जब विधानसभा चुनाव के नतीजे आ जाएंगे और अगले पांच साल के लिए सरकार तय हो जाएगी तब कोई गाय की बात नहीं करेगा और महंगाई जस की तस बनी रहेगी. वोटर एक बार फिर थोड़ा उनकी वजह से और थोड़ा खुद की वजह से ठगा जाएगा और अच्छें दिनों के इंतजार में ये सरकार भी बीते जाएगी और पाले आएगा कोई नया जुमला!

कुलकर्णी पर फेंकी गई स्याही को तेज़ाब बनते देर नहीं लगेगी

साल 2011 में पाकिस्तान के पंजाब सूबे के तत्कालीन गवर्नर सलमान तासीर के कत्ल की ख़बर ने पाकिस्तानियों के साथ बाकी दुनिया को भी सकते में डाल दिया था. तब शायद ही किसी को गुमान हुआ कि ये ऐसे घटनाएं भारत में भी घटने लग जाएंगी. दरअसल, सलमान तासीर को उनके दो बॉडी गार्ड्स ने इसलिए मौत के घाट उतार दिया था क्योंकि वे पाकिस्तान के ईशनिंदा (पैगंबर मोहमम्द आलोचना) के तत्कालीन कानून से इत्तेफाक नहीं रखते थे. सलमान तासीर अपने ही मज़हब में मौजूद कमज़ोरियों के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई में मार दिए गए. वे मुसलमान थे,पाकिस्तानी थी, ऊंचे ओहदे पर विराजमान थे, लेकिन धर्म के उन्माद ने उनकी जान ले ली.

अब आज के भारत में लौटते हैं. सुधींद्र कुलकर्णी पर शिवसेना वालों ने इसलिए स्याही फेंक दी क्योंकि वे पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शिद महमूद कसूरी की किताब के लॉन्च के प्रमुख आयोजक थे. कुलकर्णी बीजेपी के लौहपुरुष अडवाणी के मीडिया सलाहकार रहे हैं. जब इस दौर का इतिहास लिखा जाएगा तब अडवाणी का नाम भारत के विराट हिंदुओं में लिखा जाएगा. उनका नाम शायद बाला ठाकरे जैसे विराट हिंदू से तो  ऊपर ही होगा. कुलकर्णी हिंदू हैं,भारतीय भी हैं. अडवाणी जैसे विराट हिंदू के सलाहकार भी रहे हैं,लेकिन इन सबके बावजूद उन्हें बख्शा नहीं गया. कुलकर्णी के मुंह पर स्याही फेंककर शिवसेना ने खुद को ज़्यादा हिंदू और ज़्यादा भारतीय साबित कर दिया. ठीक वैसे ही जैसे सलमान तासीर के हत्यारों ने उनकी हत्या करके खुद को ज़्यादा मुसलमान, बड़ा मुसलमान साबित किया था.

साल 2014 में पाकिस्तान के शहर पेशावर में एक आर्मी स्कूल पर आतंकी हमला हुआ, इसमें 145 लोगों की हत्या हुई, जिनमें ज़्यादातर छोटे-छोटे मासूम स्कूली बच्चे थे. हमले करने वाले किसी दूसरे देश से नहीं आए थे, बल्कि पाकिस्तान सरकार के जरिए पाले गए सगे आतंकवादी थे. पाकिस्तान इस्लाम, भारत विरोध और कश्मीर के नाम पर इन्हें सालों से पालता आया है. आज इनके पालतू इन्हें ही नोच रहे हैं.

पिछले कई महीनों से भारत भी पाकिस्तान हो चला है. अगर आप इसी तरह बर्दाश्त करते रहे तो आपको पता भी नहीं चलगा कि स्याही कब तेज़ाब बन गई. आप पाकिस्तान और उन जैसे धर्म के उन्माद से भरे देशों की हालत देख सकते हैं. किसी की नफरत को आधार बनाकर पलने वाला देश पाकिस्तान हो जाता है. अब हमें ये तय करना होगा कि सालों से धार्मिक भाईचारे की परंपरा के बूते टिके रहने वाली धरती को उसी ढर्रे पर बरकरार रखना है या आतंकवादियों और दहशतगर्दों को सौंप देना है?

सलमान तासीर के तर्ज पर हम पहले से ही कलबुर्गी, पनसारे और दाभोलकर को खो चुके हैं, अगर ऐसी ही गुंडई जारी रही तो कल गए ये आंतकी हमारे बच्चों के स्कूलों पर भी हमला करने लगेंगे. हमें इनका जमकर सामना करना पड़ेगा…समाज के लिए, देश के लिए,मानवता के लिए और अपने बच्चों के भाविष्य और उनकी जान के लिए!

एक पत्रकार का समाज को खुला खत!

राजनीति की कड़िया सुलझाते-सुलझाते अब मैं खुद में ही उलझने लगा हूँ, अपने अस्तित्व पर ही सवाल करने लगा हूँ. समझ नहीं पाता मैं क्या हूँ? क्या मैं दलाल हूँ, वेश्या हूँ या फिर न्यूज ट्रेडर हूँ? क्या मैं सचमुच प्रेस्टीट्यूड हूँ? क्या मैं वो नहीं हूँ जो रोजाना गलियों में पिटता है, कभी निर्भया तो कभी गुडिया के लाठी खाता है? क्या मैं वो नही हूँ जो कभी शाहजहाँबाद तो कभी बलघाट में जलाया जाता हैं? क्या मैं वो नही हूँ जो कभी आपातकाल तो कभी दंगों में उन लोगों के लिए खड़ा होता हूँ जो कभी मेरे लिए खड़े नहीं हुए? इन सिक्के के दो पहलुओं से मिलकर ही तो मैं बनता हूँ. मुझसे ओब्जेक्टिविटी की आशा करने वाले बुध्दजीवी हमेशा मेरे लिए दलाल और प्रेस्टीट्यूड जैसे विशेषणों का ही इस्तेमाल करते हैं. उन्हें मैं नेताओं के घर आते जाते तो दिखता हूँ पर देश के पाँच सबसे गरीब जिलों में भटकते हुए नहीं. क्या वो मेरे सिक्के के सिर्फ एक पहलू को नहीं देखते हैं?

लोग मेरे सामने खड़े होकर ही मुझे गाली देते हैं. मेरी विश्वसनीयता पर सवाल करते हैं. अच्छा है कि बोलते है, सवाल करते है, मुझसे डरते नहीं. कभी सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ बोलकर देखिए. गालियों से आपकी बोलती बंद न कर दी जाये तो कहना. आप 19(a) से लेकर 66(a) सब भूल न जाए तो कहना. लेकिन मैं फिर भी लिखता हूँ हर रोज लिखता हूँ. क्यों लिखता हूँ? किसके लिए लिखता हूँ? मैं लिखता हूँ क्योंकि मुझे परवाह हैं आपकी. मैं चुप हो गया तो आवाज आपकी बंद होगी. कोई शक हो तो सोच कर देखिए कि जिन लोगों की आवाज मैं नहीं उठाता क्यों उनकी आवाज दब कर रह जाती हैं? गुड़गाँव, सूरत और दिल्ली की मजदूर बस्तियों में गुलामों की तरह रहने वाले मजदूर तभी चर्चा में क्यों आते हैं जब मैं वहाँ जाता हूँ? आपके चुने हुए प्रतिनिधियों के सामने आपका प्रतिनिधित्व मैं करता हूँ. आप मुझे चुनते नहीं,वोट नहीं देते. मुझे 6 रुपये में खाने की थाली नहीं मिलती, रहने को सरकारी घर नहीं मिलता. फिर मैं क्यों करता हूँ ये सब आपके लिए, उनके लिए जिनके लिए मैं महज एक दलाल हूँ, सत्ता और कॉरपोरेट का दलाल? मैं सरकार बना सकता हूँ, गिरा नहीं सकता. मैं मोदी और केजरीवाल बना सकता हूँ, उनसे काम नहीं करा सकता. मैं ताकतवर की तरफ होने पर ताकतवर होता हूँ कमजोर की तरफ होने पर कमजोर होता हूँ. लेकिन मैं कमजोर नहीं हूँ. मैं देश के प्रधानमंत्री की भी आँखों में आँख ड़ाल सवाल कर सकता हूँ. कमजोर आप हैं क्योंकि आप सवाल नहीं करते. नेताओं को पता है कि मैं कितनी भी मजबूती से आपके लिए खडा रहूँ आप को चुनना उसी को है. आपकी यही कमजोरी मुझे कमजोर करती हैं.

फिर भी मैं आपके सवालों पर, आरोपों पर चुप रह जाता हूँ. इसलिए नहीं की मैं सचमुच दलाल हूँ बल्कि इसलिए कि मैं खुद मे ही उलझने लगा हूँ खुद से ही सवाल करने लगा हूँ. मेरे अंदर भी एक द्वंद है क्योंकि मैं यहाँ कुछ बदलने आया था. पर मुझे हर पल सीख दी गई कि मैं कोई समाज सेवक नहीं हूँ, क्राँतिकारी नहीं हूँ. मेरी नैतिकताओं से मुझे ही बंधक बना दिया गया. और शायद धीरे-धीरे मैंने भी समझौता कर लिया. और करूँ भी क्यूँ न? सारी बगावत मैं ही नहीं करुंगा. कुछ जिम्मेदारी आपकी भी बनती है. फिर भी मेरी आत्मा मेरे शरीर से हर रोज सवाल करती है, बगावत करती है. मैं मरता भले ही न हूँ पर खुद मे ही घुटता जरूर हूँ. मुझे अपने ही आदर्शों और उम्मीदों की अर्थी का बोझ उठा कर चलना होता हैं. शायद इसलिए मैं आपके सवालों का जवाब नहीं दे पाता और जवाब भी क्यूँ और किसके लिए? उन नपुंसक लोगों के लिए जो अपनी असफलताओं को हमेशा मेरे ऊपर थोप देते हैं. सारी समस्याओं का जवाब मुझसे माँगा जाता है. जब कोई गजेन्द्र सिंह जंतर-मंतर पर फाँसी लगा लेता है तो मुझसे पूछा जाता है कि मैंने कैमरा छोड़ उसे बचाया क्यों नहीं? यह सवाल मुझसे बड़ी बेशर्मी के साथ वही लोग पूछ रहे होते है जो वहाँ किसी पार्टी के कार्यकर्ता या पुलिस वाले के रूप मे खड़े होते हैं. वोट आप देते हो, चुनते नेता को है तो समस्याओं का हल मुझसे क्यों? जब सारे काम मुझे ही करने है तो आप है ही क्यों? जब सारी परंपरा और लोग शिथिल हो चले है तो लोकतंत्र, व्यवस्था और चुनाव का इतना बड़ा ड्रामा क्यों?

सच कहूँ तो लोकतंत्र के असली गुनहगार आप ही हैँ. बस अपनी कायरता थोपने के लिए आपको कोई कमजोर चाहिए होता है. और मुझसे कमजोर आपको कौन मिलेगा? आप जाति, धर्म, परिवार के नाम पर दंगाई, बलात्कारियों, गुंड़ो को वोट देते है. वो घोटाले करते है आप चुप रहते हैं, वो गुंड़ई करते है आप चुप रहते है. किसान मरता है आप चुप रहते है, मजदूर मरता है आप चुप रहते है. ईमानदार अफसर कुचले जाते है आप चुप रहते है, मैं जलाया जाता हूँ आप चुप रहते हैँ. और आपकी बारी आती है तो आप रोते है. लोकतंत्र, मीडिया, अधिकार आपको सब याद आते है. खुद से कभी पूछा है कभी कहाँ होते है आप जब दलित महिलाओं से बलात्कार होता है? कहाँ होते है आप जब आदिवासियों के घर, जंगल और जमीन छीने जाते है? शायद सेल्फी ले रहे होते है उस रेस्टोरेन्ट में जहाँ किसी बच्चे से मजदूरी कराई जाती है. मुझे समस्या इस बात से नही कि आप चुप रहते है. मुझे समस्या इस बात से कि आप सबकुछ जानकर भी चुप रहते है. मुझे कभी भी आप से बात करते हुए यह नही लगा कि आपको कुछ नही पता होता.

आप बस कुछ न पता होने का ढ़ोग करते है ताकि मुझ पर आरोप लगा सके कि मैंने आपको कुछ बताया नहीं. मुझे तो आपसे ही पता चलता है कि नेता चोर है, बेईमान है, दंगाई है. पर जब उन्ही नेताओं को संसद और विधानसभाओं में बार-बार चुनकर आते हुए देखता हूँ तो मुझे यकीन हो जाता है कि आप पक्के दोमुंहे है, कायर है. बार-बार गलती करने वाले को गुनहगार कहा जाता है और आप भी गुनहगार है, लोकतंत्र के असली गुनहगार है. आप इन सम्मानित नेताओं को इसलिए चुन कर नहीं भेजते है कि आप अज्ञानी है, अबोध है. दरअसल आप ही दंगाई है, गुंडे है. क्या आप वो नहीं है जो दंगों मे हिन्दू और मुस्लिम मे बँट जाते है? सोशल मीडिया पर भर-भर कर गाली देने वाले भी आप ही होते है न. क्या आप वो नहीं है जो दलितों का शोषण करता है? क्या आप वो भी नहीं है जो गरीबों और मजदूरों का शोषण करता है?

क्या आपको वाकई हक है कि आप मुझसे सवाल कर सके? पर मैं फिर भी आपके आरोपों को झेलता हूँ क्योंकि मैं is equal to करने पर विश्वास नही रखता. मैं सफाई नही दे रहा. मैं बस आपको समझा रहा हूँ कि अपनी असफलताओं को मुझ पर मत थोपिए. पर चुप भी मत रहिए, कुछ बोलिए आपकी चुप्पी आने वाली पीढ़ियों को खामोश करेगी. मेरे अंदर भी काफी कुछ गलत है, इसलिए मेरे खिलाफ भी बोलिए. पर केवल मेरे खिलाफ ही मत बोलिए. जो भी गलत है उसके खिलाफ बोलिए. कभी-कभी अपने खिलाफ भी बोलिए. चंद लोगों को भ्रम हो चला है कि आप गूँगे है इसलिए चुप मत रहिए, बोलिए जनाब. जिस दिन आप बोलेंगे मुझे बोलने की जरूरत नहीं पड़ेगी. मैं तो बोलता हूँ क्योंकि आप नहीं बोलते. मैं आपके हाथों मे श्रध्दाँजलि और सांत्वना की मोमबत्ती नहीं आक्रोश की मशाल देखना चाहता हूँ. मैं जानता हूँ और मानता भी हूँ कि हम में कोई क्रांतिकारी नहीं है. पर अब समय आ गया कि हम विद्रोह करे. व्यवस्था से नही तो खुद से ही करे. एक बार बगावत करके तो देखिए, बगावत से प्यार न हो जाए कहिएगा. बगावत ही लोकतंत्र का असली स्वरूप है. और अगर आप ऐसा नहीं करें तो आप गुनहगार होंगे. लोकतंत्र के गुनहगार, आने वाली पीढ़ियों के गुनहगार.

Disrespect to Ghulam Ali or Jagjit Singh?

Another nail in the coffin of democracy! The ties between India and Pakistan are getting stronger, in terms of hatred. Day by day this disgust is increasing; adding on to this is the latest demand for stopping all cultural ties. Ghulam Ali, a Pakistani ghazal singer was forced by Shiv Sena to cancel his event in Mumbai on October 9. The protest led by Shiv Sena resulted in the cancellation of the show by the noted singer and say no to all his music love to spread in India.

This is not the first time that any Pakistani person is asked to put their step back. The same case happened with Atif Aslam’s concert in Ahmedabad & Pune. Why most of the time singers and performers are barred from executing their talent.

Let me remind you that Ghulam Ali was the one of the maestro from Lahore who rendered thumri and chaiti at the music fest, held every year since 1923 as part of Hanuman Jayanti celebrations at Sankat Mochan temple in Varanasi. Why was that not considered for cancellation? If Mumbai can give shade to all the Pakistani underworlds then what is the harm in spreading the music love in the air.

All these activities are so shameful that what an image we are creating in front of the Goddess divine soul of music. This is what Ustad Ghulam Ali also had to say about it. He is not angry but hurt for in love, such controversies shouldn’t happen; they spoil people’s sur. calling music Allah, God, Bhagwan, he said that he has always received lot of love in India and that this concert was going to be “a tribute to Jagjit Singh,” who was like a brother to him. So, this incident has not only dishonourable to a Pakistani singer but was also disrespect to an Indian Ghazal legend, Jagjit Singh. Don’t bound art by boundaries of land- the only advice to Shiv Sena.

Mystery of Most talked double Murder

 

The much talked about double murder mystery has seen numerous speculations since the mystery was hatched back in 2008. Yes, you have got me right it is about the high profile Arushi and Hemraj murder case. The case got a lot of media attention in 2008 and has been continuously tracked by media.

The media did a lot of investigative journalism, period, ‘’ journalism’’ in the case to bring out the most convenient and convincing outcomes. As a spectator then, I was convinced that the little girl was a prey to her parents aggression and I am sure  many like me had a similar opinion about the case, but the interview  of former joint director Arun Kumar in Times of India has left me in dilemma  over the process of investigation and judicial system in our country.

 

Arun Kumar,was the CBI officer who found glitches in the investigation. At a point when he could conclude the investigation he was removed from the case. This case has been handled by two different teams and both the teams have given different conclusions about the case. Finally after much of theories the parents were convicted in 2013 as accused and have been sentenced to life imprisonment. Though the order has been challenged in Allahbad High Court.

However the CBI prosecutor who had been investigating the case since day one  has refuted the claims of Arun Kumar and has said that the parents are the accused in the case.

The Arushi murder case has again come to the spotlight after Vishal Bharadwaj and Meghna Gulzar’s docudrama ‘’Talvar” has put a question mark to it. The movie  which hit the screens last week  has received a good response from the critiques as well as from the viewers at large.

Talvar’s  release has  reignited the case. It is interesting to note that the investigators and the media is busy finding the truth even after the pronouncement of judgement in the case. As per the law it is the blind lady is unbiased and it is the law which rules out the justice but here it seems to be a little different.

After so much of debate and uncertainty in the case the judiciary might reopen the case to look into all the facts.

Whatever the judgement maybe, we need to look into the loopholes in the functioning of every pillar of the constitution be it media, judiciary, legislative and executive. None of them should be vested with extra constitutional powers.

The very question intrigues me that is it the power of Cinema which has shaken the entire investigation or a failure of our judicial system. Like all the other questions this might also remain unanswered.

‘Nayantara’s Necklace’ shares striking similarities with Apte’s ‘Madly’

How good it feels when you get two good trailers back to back. Yesterday it was Radhika Apte’s Madly and today we’ve Nayantara’s Necklace. Both of these share some striking similarities like being contemporary, bold, fresh and so on.

Nayantara’s Necklace has Konkana Sen & Tilotama Shome as its lead. Konkana needs no introduction whereas Tilotama is known for the film like Children of war and monsoon wedding. She as well is an award winning actress.

Remember the lead male actor, Gulshan Devaiya from the recent adult comedy Hunterrr. He seems to be the male lead in the film. And this trio seems to represent the current FB, Twitter and extra marital relation generation. Watch it and get ready for another trendsetter.

Here is the link Watch the trailer of Nayantara’s Necklace, starring Konkana Sen & Tilotama Shome

Companies who inspire Google’s logo

Today morning the first thing that came to your notice, apart from your wife bringing tea for you, boyfriend’s messages in your phone, was the revamped and more creative logo of Google. Since 17 years, it had followed the tradition of putting same colours with changes either in its typography or putting shadow effects making the text bold or light. But this time Google has introduced a new logo and brought more reality to it through its video effect showing how it works. Google magic is working for us since years and this time it has updated from single desktop browser page to the world of seamless computing across an endless number of devices.

Apart from the only logo the other thing that got a life was the colourful Google mic, which helps to identify and interact with Google whether you’re talking, tapping or typing. Meanwhile, when we bid adieu to the little blue “g” icon with a four-color “G”, there were companies who got inspired and changed their logo too.

Heineken, a Dutch brewing company winked at new Google logo with smiling E.  They tweeted with new logo played on same colours as that by Google.

Other being an International company Luscombe Lettings, known for dealing with properties has also tried their best to play with their logo.

Earlier on the list were Motorola which itself is owned by Google, in 2013 got inspired by our Google baba and experimented with symbol M enclosed within rainbow colours.

With this, we can conclude that under the guidance of CEO Sundar Pichai, the company has entered the world of being the most creative. We can hope to witness more lively and innovative experiments on our way. This is one such beginning, better is yet to come!

Kohli achieved what others couldn’t!

Just concluded Ind-Sri Lanka test series, will always be remembered as Sangakkara’s swansong. But for newly crowned Indian captain Virat Kohli, it will always be his first taste of success. Not many would have bet for Kohli’s team to achieve this feat which even Dhoni’s dream team was not able to. In fact, it was due from 1993 when India won a test series last time in Sri Lanka. It was a tricky series as both Sri Lankan and Indian test team was under transition. Kohli’s team passed with flying colours.

Undoubtedly, Indians were dominant throughout the series. If not for that one session in the first test where Chandimal went berserk, we would have clean swept the series (India won 2-1). But let’s talk about positives first. The first thing which was pleasing to see was all the players contributing at some point of the series. Even Stuart Binny (pun intended) contributed by his stroke-filled 49 in the last innings of the last test and chipped in with a couple of crucial wickets. Kohli rightly stated, “This series belongs to bowlers”. Special mention should be given to Ashwin. He has never bowled with so much consistency throughout the series. And yes he was bowling off breaks this time! He looked so still when releasing the balls and he was quite slower in the air. This is Ashwin reinventing himself as a test bowler. And he was ably supported by Ishant and company. Ishant has been in the Indian side for nearly a decade and still he shows this kind of consistency once in a while. From troubling Ponting in his famous 2007 spell to winning a test at Lords, his noteworthy contributions come very far in between. This can’t be acceptable for a guy who wants to spearhead the Indian bowling unit. Umesh Yadav and Amit Mishra also did their job convincingly.  And I would see this as Harbhajan’s last series as he would not be playing in Indian test side again.

Moving on to batting department which is really very vulnerable. My generation has never seen Indian batting department constantly being changed. We are quite used to Dravid, Tendulkar and Laxman coming out to bat one after another with support from Sehwag, Ganguly, Gambhir, and Dhoni. Gone are those days and we have to stop being nostalgic. Coming back to present, I would say we don’t have many quality test batsman to choose from. But the current Indian test team will have Murali Vijay, Pujara, Rahane and Kohli as regulars in all conditions. I won’t compromise on these players even if they have failed in some matches. These four should be the core of Indian test batting team for near future. Other places should be fought by KL Rahul, Rohit Sharma, Dhawan and others. This series have not been dominated by any single batsman. And all have played useful knocks once in a while. Pujara once again proved that he is the class act and cannot be side-lined. His only complete failure has been Australia series and other than that I have not seen him returning from a tour without any contribution. His test average is still more than 50 and better than the rest of the wolf pack. And as far as wicketkeeper is concerned I would go for W Saha (we miss u Dhoni). However, Naman Ojha has shown some promise but he could have done much better. I would say N Ojha missed a great opportunity to cement his place.

Enough of laurels now. We have to accept that this was one of the weakest Sri Lankan team which were also beaten by Pakistan few months back with the same margin.  We were on top for the most part of the first match, but we didn’t finish it. A numerous number of times in the last decade I have seen India losing a test match for not removing the tail ender of the opposition. We lack killer instincts of the Australian. People say that it’s in our genes. But I firmly believe that Kohli is here to change this notion. And I would give credit to Kohli for his proactive captaincy in this series. He was never complacent and always tried to get things done rather than waiting for things to happen.

As my favourite captain, Ganguly always stresses that a team’s legacy is determined by how they perform outside of the subcontinent in test matches. I firmly believe this and will have my fingers crossed. What gives me hope is Kohli’s mind-set which is evident in his recent statement “I am ready to loose trying to win”.

“Fortis Healthcare” – This is indeed very shameful

Recently I have been coming across so many incidents against this hospital and to my shock beingsuch a famous brand when it comes to health care it doesn’t even react to the allegations. May be it still hasn’t realized the power of social media yet.Recently a car driver Sandeep in Delhi lost his 17 day old child on the night of 22nd Aug, 2015. The infant was in Fortis Hospital Vasant Kunj hospital for barely 10 minutes before he breathed his last. The hospital ran up a bill of Rs 20,000 and refused to release the body unless the amount was paid in full.  

The poor man when called up his owner for intervention the man could finally go with his son’s dead body only the next morning, having spent 18,000, which was paid during admission. When the owner himself intervened he was met with more aggression. He then took out his phone and began recording, all the while, continuing to ask them about the rules under which they can detain a body with them like that. At this, the staff members snatched away his phone, demanding that he should delete the video if he wants it back. For the record, Fortis is still holding on to his phone. All this transpired at the hospital’s reception, in the clear view of CCTV cameras.

A slight look at this forum http://www.consumercomplaints.in/fortis-healthcare-b100262 would actually list out how the system of Fortis Healthcare actually works. And this just one of the many websites which have similar content and complaints. Forget about their website just check out their Facebook page wherein people have posted their experience. Its more saddening that police complaints are also not taken care of. Doctors are considered as gods in our country but as the series of events unfolds it shows quite a opposite picture. Isn’t it?