हिम्मते मर्दा, मददे खुदा…चाय बेचने वाले ने देश के सबसे बड़े बैंक को चटाई धूल

हिम्मते मर्दा, मददे खुदा…आपने ये लाइन शायद कहीं सुनी हो पर इस कहानी को पढ़ने के बाद आपका इसमें भी यकीन हो जाएगा कि जब हिम्मत हो तो कुछ भी संभव है. इस ममला के दो मुख्य किरदार है जिसमें एक तरफ तो पांचवीं पास राजेश सकरे हैं और दूसरी तरफ देश का सबसे बड़ा बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया है.

लड़ाई की वजह बहुत बड़ी नहीं थी फिर भी लड़ाई बहुत बड़ी थी. लड़ाई 9,200 रुपए की एक रकम पर टिकी थी. मामले की सबसे खास बात ये है कि पांचवीं पास सकरे ने इतने बड़े बैंक के खिलाफ लड़ने के लिए कोई वकील नहीं हायर किया बल्कि खुद ही अपनी वकालत की.
भोपाल समाचार में छपि एक ख़बर के मुताबिक मामला 2011 में शुरू हुआ. जब सकरे को पता चला कि उनके अकाउंट में जमा 9,200 रुपए की रकम को सफाचट कर दिया गया है जबकि उन्होंने ये पैसे निकाले ही नहीं. वे तुरंत लोकल ब्रांच में शिकायत दर्ज कराने पहुंचे.
सरकारी दफ्तरों का हाल देश में किसे नहीं पता, सकरे को भी उसी हाल का सामना करना पड़ा और बैंक वालों ने उल्टे सकरे पर ही दोष मढ़ दिया. चार साल चले इस मामले में उन्होंने एसबीआई के मु्ंबई हेड ब्रांच तक का दरवाज़ा खटखटाया पर वहां भी उनके हाथ कुछ नहीं लगा.
फिर सकरे ने ज़िले के कंज्यूमर फोरम में अपनी शिकायत दर्ज कराई. देश के सबसे बड़े बैंक के वकीलों के खिलाफ इस पांचवीं पास आदमी ने खुद की वकालत खुद ही की. बैंक के वकीलों ने दावा किया कि सकरे ने पैसे निकाल लिया थे और बैंक पर झूठा आरोप लगा रहा है. पर वकील सबूत दिखाने में नाकाम रहे.
12वीं सुनवाई के बाद सकरे की जीत हो गई. इसके बाद कोर्ट ने बैंक को 6% ब्याज के साथ सकरे के पैसे लौटाने के आदेश दिया. कोर्ट ने इसके अलावा 12,000 रुपए का एक और जुर्माना बैंक पर लगाया. इसके लिए कोर्ट ने जो दलील दी उसमें मामले के दौरान सकरे को हुई परेशानी और कोर्ट-कचहरी के चक्कर में खर्च हुए उसके पैसे भी शामिल थे. क्यों अब भी आपको यकीन हुआ या नहीं कि अगर हिम्मत हो तो ऊपरवाला भी साथ देता है.

नमूनों के हाथ सिनेमा

एक तरफ जहां गजेंद्र चौहान की नियुक्ति के खिलाफ एफटीआईआई के छात्रों का विरोध प्रदर्शन अभी थमा नहीं है वहीं दूसरी तरफ पूरे बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक को झटका देने वाली ख़बर सामने आई है. अंग्रेज़ी अख़बार डीएनए की एक ख़बर की माने तो मोदी सरकार ने गुजराती अभिनेता नरेश कनोड़िया को एक ऐसे काम के लिए चुना है जिसे जानकर आपके कान खड़े हो जाएंगे.

दरअसल जिस शख्स का अपने आज तक नाम तक नहीं सुना होगा उनको अब ये तय करने का अधिकार मिलने वाला है कि भारत कि किस फिल्म को ऑस्कर के लिए भेजा जाना चाहिए. अमोल पालेकलर की अध्यक्षता वाली एक समिति है जो यह तय करती है कि किस बॉलीवुड फिल्म को ऑस्कर के लिए भेजा जाना है, ख़बर के मुताबिक कनोड़िया को उसी समिति का हिस्सा बनाए जाने की बात हो रही है.
बातते चलें कि कनोड़िया एक्टर होने के अलावा पीएम मोदी के गृहराज्य गुजरात से आते हैं और सबसे खास बात यह है कि वे बीजेपी नेता भी हैं. एक तरफ जहां मसान और मांझी जैसी फिल्में भारतीय सिनेमा की तस्वीर बदलने की कोशिश कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार भी इस तस्वीरों को बदलने के लिए पूरा ज़ोर लगा रही है. पर सरकार जिस तरह का ज़ोर लगा रही है उससे भारतीय सिनेमा का हाल भी संसद के जैसा मत हो जाए.