दिल्ली और बिहार में हारने वाली बीजेपी का बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडू में क्या होगा!

 

प्रधानमंत्री जी, आप विकास का एजेंडा लेकर निकले थे…कितने सुहाने थे वो अच्छे दिन के वादे, वो हर खाते में 15 लाख देने की बातें लेकिन बिहार पहुंचते-पहुंचते आपको आरक्षण नाग ने डस लिया. आप जिस दूसरे धर्म वालों को 5 फीसदी आरक्षण का मुद्दा उछाले थे वो आपके भी उतने ही हैं, आखिर आप तो देश के मुखिया ठहरे! लगता है कि आप अभी तक गुजरात के फिज़ाओं से बाहर नहीं आए हैं.

आप ही बताइए कि आपके पार्टी अध्यक्ष ने बिहारियों को क्या समझकर ये कहा था कि अगर आप वहां हारे तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे? सर, गुजरात भले ही पाकिस्तान से बॉर्डर शेयर करता हो लेकिन बिहार तो नेपाल से बॉर्डर शेयर करता है. ये और बात है कि आपके आने के बाद से उस मित्र देश से भी भारत के रिश्ते ख़राब हो गए. ये भी अलग बात है कि चुनाव के बीच ही भारत-नेपाल सीमा में हुए प्रदर्शन में दो बिहारी मारे गए. पाकिस्तान में पाटखे वाले बयान का तुक क्या था, अब शायद आपको भी पता चल गया होगा कि आखिर वो बयान कितना बेतुका था?

सर, गिरिराज सिंह जी लोगों को जब मन तब पाकिस्तान भेजते रहते हैं. हैं कौन वो! एक जिले से सांसद और आपके मंत्री…पांच साल बाद होंगे कि नहीं उनको भी नहीं पता लेकिन देशभक्ती का सर्टिफिकेट बांटते फिरते हैं. सर, जब पूरी पार्टी आपके कंट्रोल में है तो ऐसे फ्रिंज एलिमेंट इस तरह की बयानबाजी कैसे कर लेते हैं.

एक बात और सर, हिंदुओं के लिए गाय का धार्मिक महत्व बहुत ज़्यादा है लेकिन बिहार को राज्य के तौर पर अभी भी रोटी, कपड़ा और मकान मयस्सर नहीं है. गाय पर राजनीति करते समय शायद आपलोग भूल गए कि लोगों के ज़ेहन में अभी तक अयोध्या वाले राम कौतूहल करते हैं, कई बार सवाल भी करते हैं कि मंदिर बना दिया क्या…अगर नहीं तो इतना बवाल क्यों हुआ था भाई!? वही हाल आपने गाय का भी कर दिया, राम की तरह गाय पर भी लोगों की आस्था ख़तरे में है. सर, सवाल है कि गाय को आगे करके डिजिटल इंडिया और मेक इंन इंडिया कैसे होगा.

शायद आप और आपकी पार्टी बार-बार भूल जाते हैं कि भले अंदर-अंदर और सोशल मीडिया पर आपका एजेंडा हिंदुत्वा था लेकिन आम चुनाव में भी आपको 31% वोट मिला है. उसमें एक बड़ा तबका वो भी होगा सर जो अच्छे दिन के जुमले में फंस गया होगा. सर, आपके लोगों ने धर्मनिरपेक्षता को जेहाद जैसा शब्द बना दिया है. खुद को सेक्यूलर बताने में लोग अब डरते हैं. लेकिन प्रोपगैंडा स्थाई नहीं होता सर, जर्मनी से रूस तक बुलट थ्यरी (एक झूठ को सौ बार बोलो ताकि वो सच हो जाए) फौरी तौर पर चलने के बाद फुस हो गई.

दिल्ली और बिहार की हार में एक बात समान है कि दोनों जगह आपकी पार्टी ने निगेटिव कैंपेन किया. आपको तो याद ही होगा कि 2014 के आम चुनावों से पहले कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर ने आपको चाय वाला बताकर मजाक उड़ाया. कैसे हवा हो गए वे. आप पीएम बन गए, मणिशकर अय्यर के भी पीएम…खैर! दिल्ली विधानसभा चुनाव 2015 में आपने वही किया जो अय्यर ने आपके साथ किया था. आप दिल्ली के पूर्व सीम केजरीवाल को नक्सली बता गए और तब से लेकर अंत तक निगेटिव कैंपेन के जाल में फंस गए. ये सिलसिला बिहार में भी जारी रहा वरना अपने लोगों को कौन पाकिस्तानी करार देता है. नतीजे आपके सामने हैं.

किसी भी सूरत में बिहार को अगले पांच साल तक ठीक शासन नहीं मिलने वाला, नहीं लगता कि राज्य को जो सरकार मिलने वाली है वो बहुत बेहतर सरकार है. लेकिन एक बात तय है कि बिहार की तरह आने वाले चुनावों में बीजेपी की भी दुर्गती तय है. सोचिए जब दिल्ली में रहकर आपसे दिल्ली नहीं बची और बिहार में सलों तक सरकार में रहकर बिहार नहीं बचा तो असम, बंगाल, केरल, तमिलनाडू में तो आप न कहीं थे और ना कहीं हैं. राज्यसभा में बहुमत का सपना तो सपना ही रह जाएगा.

एक बात तय है कि आपकी पार्टी अब 1992 या 2014 के पहले वाली बीजेपी नहीं रही. कांग्रेस के बाद आप देश की एकमात्र दूसरी पार्टी हैं जिसने अपने बूते सरकार बना ली. लेकिन उसके लिए आपको इंदिरा गांधी का गरीबी हाटाओ के तर्ज पर अच्छे दिन का जुमला उछालना पड़ा. इस देश में ऐसे ही जुमले चलते हैं. इन्हीं जुमलों पर बहुमत की सरकारें बनती हैं. आपकी सरकार उसका सुबूत है. वरना आपको याद होगा कि 1992 के आपकी स्थिति सुधरी ज़रूर लेकिन आप सरकार बनाने की स्थिति में आधे सेक्यूलर वाजपयी जी के नेतृत्व में आए, सांप्रदायिक अडवाणी के नेतृत्व में नहीं. वहीं 2004 के आम चुनाव में हार के कारण पर बात करते हुए वाजपयी जी ने गोधरा दंगों को भी बड़ा कारण बताया था. राम, अल्लाह, गाय और सूअर काठ की हांडियां हैं सर, एकाधी बार चढ़ सकती हैं…बार-बार नहीं.

हिम्मते मर्दा, मददे खुदा…चाय बेचने वाले ने देश के सबसे बड़े बैंक को चटाई धूल

हिम्मते मर्दा, मददे खुदा…आपने ये लाइन शायद कहीं सुनी हो पर इस कहानी को पढ़ने के बाद आपका इसमें भी यकीन हो जाएगा कि जब हिम्मत हो तो कुछ भी संभव है. इस ममला के दो मुख्य किरदार है जिसमें एक तरफ तो पांचवीं पास राजेश सकरे हैं और दूसरी तरफ देश का सबसे बड़ा बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया है.

लड़ाई की वजह बहुत बड़ी नहीं थी फिर भी लड़ाई बहुत बड़ी थी. लड़ाई 9,200 रुपए की एक रकम पर टिकी थी. मामले की सबसे खास बात ये है कि पांचवीं पास सकरे ने इतने बड़े बैंक के खिलाफ लड़ने के लिए कोई वकील नहीं हायर किया बल्कि खुद ही अपनी वकालत की.
भोपाल समाचार में छपि एक ख़बर के मुताबिक मामला 2011 में शुरू हुआ. जब सकरे को पता चला कि उनके अकाउंट में जमा 9,200 रुपए की रकम को सफाचट कर दिया गया है जबकि उन्होंने ये पैसे निकाले ही नहीं. वे तुरंत लोकल ब्रांच में शिकायत दर्ज कराने पहुंचे.
सरकारी दफ्तरों का हाल देश में किसे नहीं पता, सकरे को भी उसी हाल का सामना करना पड़ा और बैंक वालों ने उल्टे सकरे पर ही दोष मढ़ दिया. चार साल चले इस मामले में उन्होंने एसबीआई के मु्ंबई हेड ब्रांच तक का दरवाज़ा खटखटाया पर वहां भी उनके हाथ कुछ नहीं लगा.
फिर सकरे ने ज़िले के कंज्यूमर फोरम में अपनी शिकायत दर्ज कराई. देश के सबसे बड़े बैंक के वकीलों के खिलाफ इस पांचवीं पास आदमी ने खुद की वकालत खुद ही की. बैंक के वकीलों ने दावा किया कि सकरे ने पैसे निकाल लिया थे और बैंक पर झूठा आरोप लगा रहा है. पर वकील सबूत दिखाने में नाकाम रहे.
12वीं सुनवाई के बाद सकरे की जीत हो गई. इसके बाद कोर्ट ने बैंक को 6% ब्याज के साथ सकरे के पैसे लौटाने के आदेश दिया. कोर्ट ने इसके अलावा 12,000 रुपए का एक और जुर्माना बैंक पर लगाया. इसके लिए कोर्ट ने जो दलील दी उसमें मामले के दौरान सकरे को हुई परेशानी और कोर्ट-कचहरी के चक्कर में खर्च हुए उसके पैसे भी शामिल थे. क्यों अब भी आपको यकीन हुआ या नहीं कि अगर हिम्मत हो तो ऊपरवाला भी साथ देता है.

नमूनों के हाथ सिनेमा

एक तरफ जहां गजेंद्र चौहान की नियुक्ति के खिलाफ एफटीआईआई के छात्रों का विरोध प्रदर्शन अभी थमा नहीं है वहीं दूसरी तरफ पूरे बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक को झटका देने वाली ख़बर सामने आई है. अंग्रेज़ी अख़बार डीएनए की एक ख़बर की माने तो मोदी सरकार ने गुजराती अभिनेता नरेश कनोड़िया को एक ऐसे काम के लिए चुना है जिसे जानकर आपके कान खड़े हो जाएंगे.

दरअसल जिस शख्स का अपने आज तक नाम तक नहीं सुना होगा उनको अब ये तय करने का अधिकार मिलने वाला है कि भारत कि किस फिल्म को ऑस्कर के लिए भेजा जाना चाहिए. अमोल पालेकलर की अध्यक्षता वाली एक समिति है जो यह तय करती है कि किस बॉलीवुड फिल्म को ऑस्कर के लिए भेजा जाना है, ख़बर के मुताबिक कनोड़िया को उसी समिति का हिस्सा बनाए जाने की बात हो रही है.
बातते चलें कि कनोड़िया एक्टर होने के अलावा पीएम मोदी के गृहराज्य गुजरात से आते हैं और सबसे खास बात यह है कि वे बीजेपी नेता भी हैं. एक तरफ जहां मसान और मांझी जैसी फिल्में भारतीय सिनेमा की तस्वीर बदलने की कोशिश कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार भी इस तस्वीरों को बदलने के लिए पूरा ज़ोर लगा रही है. पर सरकार जिस तरह का ज़ोर लगा रही है उससे भारतीय सिनेमा का हाल भी संसद के जैसा मत हो जाए.

भारत-पाकिस्तान दोनों ही अपनी तरह से डिप्लोमेसी के फ्रंट फुट पर खेल रहे हैं

आतंक पर किये गए अपने वादे से एक बार फिर यूटर्न लेते हुए पाकिस्तान ने आतंकी लखवी के वॉयस सैंपल भारत को देने से इंकार कर दिया. पाकिस्तानी सरकार के वकील ने स्पष्ट किया कि उनकी सरकार इस सम्बन्ध में किसी भी हाई कोर्ट में याचिका दायर नही करेगी. इसे पाकिस्तानी सरकार की मजबूरी और दोगरेपन, दोनों ही रूप में देखा जा सकता है. हालाँकि भारत सरकार का दावा भी गलत था. पाकिस्तानी सरकार महज अपने क़ानूनी दायरों के अंदर वॉयस सैंपल को लेकर जो कर सकते है वो करने का वादा किया था. उन्होंने कभी भी वॉयस सैंपल देने का वायदा नही किया था. फिर भी हाई कोर्ट में अपील करना सरकार की जिम्मेदारी तो बनती है.

पाकिस्तान इस वक्त डिप्लोमेसी के फ्रंटफुट पर है. अगर हम इस समय की एशियाई कूटनीति पर नज़र डालें तो पाकिस्तान जियोपोलिटिकल रूप से काफी मज़बूत दिखता है.

  1. चीन से उसकी नज़दीकी जगजाहिर हैं. चीन ने ही संयुक्त राष्ट्र में लखवी पर प्रस्ताव को वीटो किया था.

  2. चीन ने ही 46 अरब डॉलर की परियोजना पर भी हस्ताक्षर किये हैं जो पाक अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरेगी. ये परियोजना पाकिस्तान का रंग रूप बदल सकती हैं.

  3. हमारा पुराना मित्र रूस भी पाकिस्तान के नज़दीक आ रहा है.

  4. अफ़ग़ानिस्तान में अशरफ घनी के राष्ट्रपति बनाने के बाद से ही पाकिस्तान ड्राइविंग सीट पर हैं.

  5. अमेरिका द्वारा उसे दी जाने वाली आर्थिक मदद भी लगातार जारी हैं. यह सब जानते हुए भी कि इसका इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए होता हैं.

दरअसल पाकिस्तान एक ऐसा मोहरा बन चुका हैं जिसे सभी अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं. और पाकिस्तान उन्हें सिर्फ भारत के खिलाफ इस्तेमाल करना चाहता हैं. बावजूद भारत सरकार ने पिछले कुछ समय में ऐसे अहम कूटनीतिक फैसले लिए हैं जो दूरगामी फैसलों के तौर पर भारत को फायदा पहुचाएंगे.

  1. ऊफ़ा में जारी संयुक्त बयान में कश्मीर का जिक्र भी न होना एक कूटनीतिक जीत के तौर पर देखा जा सकता हैं और वो भी तब जब पाकिस्तान ड्राइविंग सीट पर है.

  2. अब जब ईरान परमाणु संधि हो चुकी हैं तब ईरान से आर्थिक प्रतिबंध हटने की सूरत में भारत सबसे ज्यादा लाभ पाने वाले देशों में से एक होगा. ईरानमें ही भारत द्वारा बनाया जाने वाला छाबर पोर्ट ईरान और मध्य एशिया में भारत के लिए नए आर्थिक द्वार खोलेगा.

  3. छाबर पोर्ट के महत्व को देखते हुए मध्य एशिया के पांच देशों का दौरा महत्वपूर्ण हो जाता है. इन देशों से अच्छे सम्बन्ध होने की सूरत में छाबर पोर्ट भारत को एक समुन्द्री रास्ता देगा. जाहिर है अपने पड़ोस में भारत की इतनी पैठ शायद ही पाकिस्तान को पसंद आये.

  4. लैंड बॉउंड्री समझोता होने के बाद बांग्लादेश (1971 के युद्ध के पहले पूर्वी पाकिस्तान) के साथ सम्बन्धों को भी एक नई दिशा मिलेगी.

बातचीत क्यों?

भारत पाक सम्बन्धों में भले ही बातचीत को अहम बताया जाता हो पर इस बातचीत से आजतक कुछ ठोस बाहर निकलकर नहीं आया है. बातचीत द्वारा ही निकले शिमला और लाहौर समझौतों को दोनों देशो में से कोई भी नहीं मनाता हैं. जब तक दोनों देशो में धर्म और कट्टरता नहीं कम होती बातचीत से कुछ खास हासिल नहीं होगा. साथ ही पाकिस्तान में चल रही समानांतर सरकारें (सेना, आईएसआई, कट्टरपंथी) भी इस राह में बड़े अवरोधक हैं.

मोदी सरकार की पाकिस्तान नीति

पिछली सरकार की तरह मोदी सरकार की पाकिस्तान को लेकर नीति स्पष्ट नही हैं. सरकार ना तो दाऊद को खीच कर ला पाई और ना ही कश्मीर को छुड़ा पाई (सरकार ने कम से कम दावा ऐसा ही किया था) लेकिन सरकार द्वारा लिए गए कुछ अहम कूटनीतिक फैसलों की सराहना जरूर की जा सकती है. साथ ही सरकार को चीन की तरह ही पाकिस्तान के साथ भी विवादित मुद्दों को किनारे कर आर्थिक सम्बन्ध मज़बूत करने पर ध्यान देना चाहिए. सरकार को आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को खेलने की इज़ाज़त भी दे देनी चाहिए. इससे सरकारें ना सही दोनों देश के लोग तो नज़दीक आएंगे.

ये है इंडिया का त्यौहार- हो गया बंटाधार

[box]By Ajay[/box]

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ये है इंडिया का त्यौहार- ये लाईन तो आपने सुनी ही होगी. बस यही छोटी सी लाईन काफी है आईपीएल का गडबडझाला समझने के लिए. आईपीएल ने खेल को त्यौहार बना दिया. त्यौहार बना दिया! चियर लिडरस का, लेट नाईट पार्टिज़ का त्यौहार. जेनटलमैन गेम क्रिकेट को खेलने वाले खिलाडियों ने कभी सोचा ना होगा की एक दिन ऐसा भी आएगा जब इस खेल के भी खिलाडीयों की खरीद-फरोख्त होगी. खुले बाजार में क्रिकेटरों की निलामी आईपीएल से ही शुरु हुई. खुद को पैसे से मालामाल होता देख खिलाड़ी भी बिना किसी विरोध के निलाम होते रहे. कुल मिलाकर ये खेल एक बिजनेस का रुप धारण कर चुका है और बिजनेस में तो सबकुछ जायज होता है.

सारी टीमों के मालिक बिजनेसमैन, सबकुछ पैसा कमाने के लिए किया जाने लगा. जाहिर सी बात है कि कोई बिजनेसमैन किसी चीज में तभी पैसा लगाता है जब उसे उसमें अपना फायदा दिखाई पडता हो. खेल को बढावा देने के लिए अगर पैसे लगाने होते तो उसके और भी कई रास्ते थे. सहारा की टीम इंडिया की स्पांसरशिर खत्म हो जाने के बाद भी बीसीसीआई को स्पांसरशिर के लिए कोई दूसरी कंपनी नहीं मिली थी. फिर कुछ समय के लिए सहारा की ही स्पांसरशिर बढ़ा दी गयी थी मगर आईपीएल में बिजनेसमैन पैसा लगाने के लिए ललायित रहते हैं.

कमाई का साधन सिर्फ खेल ही नहीं सट्टा भी बन गया. आईपीएल के मैचों पर सट्टा लगाने वालों में कॉलेज के स्टूडेंटस से लेकर बड़े-बड़े सट्टेबाज तक शामिल है. जब सट्टा भी करोडों में लगने लगा तो फिर टीम मालिक और खिलाडी इससे कहां दूर रह पाते. सट्टे के इस खेल ने अपना दूसरा रुप धारण कर लिया जिसे मैच फिक्सिंग कहते हैं. सबसे पहले निशाना नये खिलाडियों को बनाया गया, शुरुआत गेंदबाजों से हुई. किसी टीम के सभी खिलाड़ियों का फिक्स होना तो मुश्किल है इसलिए तीन से चार खिलाडियों को फिक्स कर लिए जाता. फिक्सर जानते थे कि बड़े खिलाडीयों को फसाना मुश्किल है क्योंकी वो खेल के लिए खेलते हैं ना कि उन्हें पैसो की कोई खास जरुरत है. इसलिए क्रिकेट की दुनिया में पैर रख रहे खिलाडियों को चुना गया.

क्रिकेट के इस नंगे नाच के बारे में जानते सब थे भले ही वो इसमें शामिल ना हों. ये भी हो सकता है कि कोई खिलाडी सन्यास लेने के बाद सारी असलियत उडेल कर रख दे. फिक्सर इतने पावरफुल हो चुके हैं कि वो आईपीएल शुरु होते ही बता देते है कि इसबार कौन सी टीम मैच जीत रही है. ये सब रुके भी कैसे जब बीसीसीआई खुद संदेह के घेरे में है. श्रीनिवासन से लेकर चेन्नई सुपर किंग के बड़े खिलाड़ी भी इसकी गिरफ्त में हैं. जानकारों के मुताबिक आईपीएल तो बना ही इसी के लिए है. तो आप भी समझ जाइये कि ये इंडिया का किस तरह का त्यौहार है और इंतजार कीजिए सुप्रीम कोर्ट में बंद लिफाफे में जमा नामों के सार्वजनिक होने का.

अभी तक ये नाम सिर्फ इसलिए सार्वजनिक नहीं किये गये ताकि क्रिकेट की शाख को बट्टा ना लागे. भारत में सबसे अधिक देखे जाने वाले खेल से दर्शकों का विशवास ना उठ जाए, इसलिए सुप्रिम कोर्ट भी इस मामले में फूंक फूंक कर कदम रख रहा है.

अबकी बार, पलटीमार सरकार- 25 सालों में आएंगे अच्छे दिन!

[box]By Pramod[/box]

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भाजपा सरकार तो अच्छे दिन लाने वाली थी. अच्छे दिनों का इंतजार करते-करते मेरे उम्र का एक वसंत तो बीत चुका है. प्रधान सेवक जी ये तो गलत बात है. आपने साठ साल के बदले साठ महीने मांगे थे ना? देश ने आपको साठ महीने राज करने के लिये सिर्फ मत ही नहीं बहुमत भी दिया. बदले में आपने अच्छे दिनों का वादा किया था. अब तक हमने कुछ बोला. नहीं क्योंकि काला धन और अच्छे दिन आने के नहीं होते. इनके सिर्फ सपने ही सुहाने होते है हकीकत की पिच पर आते ही ये क्लीन बोल्ड हो जाते है.

चलिये अच्छे दिनों की बात अच्छे दिनों के लिये छोङते है. लेकिन कम से कम से अपनी बातों और वादों से इतना यू टर्न तो नहीं लेना चाहिये. अमित शाह कहते है कि देश की तस्वीर बदलने के लिये जनता से मांगे गये साठ महीने काफी नहीं है. कह दिया कि देश को एक नंबर बनाने के लिये 25 साल चाहिये. अब बताओ 15 लाख के लिये खुलवाया गया मेरा खाता 25 साल में तो बंद हो जायेगा. मेरी तो छोङो 25 सालों में तो कांग्रेस के युवराज मार्गदर्शक मंडली में पहुंचने वाले हो जायेंगे. और तो और 25 साल में तो मोदी जी पूरी दुनिया कई बार घूम चुके होंगे. मुझे तो लगता है इतने में किसी नये देश की खोज भी कर लेंगे. फिर उसे चाहे तो आप विश्वगुरु बना सकते हो.

कितनी बार और पलटना बाकि रह गया है. पहले 15 लाख पर चुनावी जुमला कह कर पलटी मार ली. फिर काला धन है तो सही पर है कितना ये पता नहीं कह कर पलटी मार ली. फिर एफडीआई के मामले पर पलटी और अब 5 की जगह 25 कह कर पलटना. इतनी बार पलटने के बाद तो पलटी भी पलट जाती है. पर ये एनडीए की सरकार है जनाब यहां जुमले बनाये जाते है.

अरे सरकार एक बात बताइये 25 साल में आप और क्या करेंगे. भारत को आपने स्वच्छ बना दिया. योगा से लोग स्वस्थ हो रहे है. जन धन से हर जन तक धन पंहुच रहा है. सब्जी वाला तराजू छोङ कर डिजीटल कांटे से सब्जी तोल कर इंडिया को डिजीटलाइज करने में अपना योगदान दे रहा है. अब उसका थोङा सा कौशल विकास कर दिया तो वो ऑनलाइन सब्जी बेचना शुरु कर देगा. देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई आंदोलन नहीं हो रहा. गंगा थोङे दिनों में साफ हो ही जायेगी. देश में जब इतने दिनों में ही सब कुछ मंगल कुशल है तो 5 साल भी काफी है 25 साल से कोई क्या करेगा.
पलटने के सीजन में हर कोई पलटता है. लेकिन जिस दिन 5 और 25 का हिसाब लेकर जनता ने बाजी पलट दी उस दिन सौ का भी शून्य हो सकता है. इतिहास गवाह है कि जब जनता पलटने पर आती है तब 100 साल वालों को 44 पर लाकर छोङ देती है. साठ साल से शासन करने वालो को साठ सीटें भी नसीब नहीं हुई.

मैंने तो ये भी सुना है के इतिहास खुद को दोहराता भी है. हिस्ट्री रिपीट्स इटसेल्फ. इसलिये मैंने तो अपना सारा ध्यान बातों की बजाय काम करने पर लगाना शुरु कर दिया है. वैसे भी मेरे मन की बात सुनता कौन है क्योंकि मैं तो मन मुताबिक बातें करता हूं. इसलिये नो बात सिर्फ एक्शन.

तो इन वजहों से बिहार का सीएम ऊँची जाति का होगा

[box]By Tarun Krishna[/box]

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बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बीजेपी के जरिए पिछड़ी जाति के पीएम बताए गए नरेंद्र मोदी के सारथी अमित शाह ने चुनावी मुहिम की शुरुआत के लिए रथ यात्रा को चुना है. इसके अपने ही फायदे हैं. रथ का नाम आते ही ज़ेहन में राम मंदिर आंदोलन की यादें दौड़ जाती हैं. तब माहौल मंडल बनाम कमंडल था. आज, करीब 25 साल बाद भी हालात जस के तस हैं. फर्क बस इतना है कि बीजेपी धर्म के साथसाथ जाति की ताकत से भी खूब वाकिफ है. बीजेपी ने पीएम मोदी को पहला ओबीसी पीएम तो बता दिया पर फैक्ट और फ्यूचर इसके खिलाफ है. बिहार में लालू यादव के उदय के बाद सवर्ण राजनीति का जो बर्चस्व टूटा था, अगर बीजेपी की सरकार बनी तो वो दोबारा वापस लौट सकता है. इसके पीछे तथ्यों की भरमार है

1. महराष्ट्रदेश की आर्थिक राजधानी में बीजेपीशिवसेना ने 2014 में गठबंधन सरकार बनाई. चुनाव पीएम मोदी के नेत़त्व में लड़ गया था. यहां बीजेपी ने अपना सीएम पद उम्मीदवार नहीं बताया था. चुनाव जीतने के बाद बीजेपी ने ऊंची जाति से आने वाले देवेंद्र फडनवीस को सीएम बना दिया. गठबंधन सरकार होने के बावजूद पार्टी ऐसी स्थिति में थी कि मोदी जिसे चाहते सीएम बना देते, बावजूद इसके उन्होंने किसी महिला, दलित या पिछड़े को चुनने के बजाए ब्राह्मण जाती से आने वाले फडनवीस को सीएम बना दिया.

2. हरियाणायहां का मामला भी महाराष्ट्र जैसा ही रहा. यहां तो गंठबंधन जैसी स्थिति भी नहीं थी. बावजूद इसके पीएम ने अपने एक पुराने सहयोगी मनोहर लाला खट्टर को कुर्सी सौंप दी, जो ऊंची जाति से ही आते हैं. अगर हरियाणा में बीजेपी किसी महिला, दलित या पिछड़े को सीएम चुनती तो उसका विरोध करने के लिए शिवसेना जैसी कोई सहियोगी पार्टी भी नहीं थी.

3. झारखंडझारखंड विधानसभा चुनावों के बाद चुने गए एक एक और पपेट (कठपुतली) सीएम ने इस बात को पुख्ता कर दिया कि मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी ऊंची जाति वालों से नीचे देखने को तैयार नहीं है. पार्टी ने यहां रघुवर दास को राज्य का सीएम बना दिया. दास बीजेपी के कोर वोट बैंक बनिया समुदाय से आते हैं. बताते चलें कि बीजेपी का कोर वोट बैंक ब्राह्मण और बनिया समुदाय है. बिहार चुनाव जीतने के लिए रघुवर दास को झारखंड का सीएम बनाया जाना बनिया समुदाय के वोट वैंक को गोलबंद करने वाले मूव के तौर पर देखा जाता है.

4. दिल्लीभले ही किरण बेदी सीएम बनने का सपना संजोय राजनीति से सन्यास की ओर चल दी हों, लेकिन बेदी भी ऊंची जाति से आती हैं. दिल्ली देश की राजधानी है और यहां होने वाली घटनाएं देश के लिए नाजीर बन जाती हैं. मोदी के पीएम बनने के बाद का यह पहला चुनाव था जब उन्होंने नेतृत्व की कमान किसी महिला को दी. पर यहां भी पिछड़ी जाति के पीएम ने एक सवर्ण को सीएम पद की उम्मीदवारी के लिए चुना. बेदी ऐसी अपवाद महिला हैं जिनका उत्थान महिला सशक्तिकरण के किसी पैमाने पर खरा नहीं उतरता.

5. छतीसगढ़चावल वाले बाबा के नाम से मशहूर छतीसगढ़ के सीएम का नाम ताज़ा तरीन चावल घोटाले में सामने आया है. वैसे तो पीडीएस (जन वितरण प्रणाली) के लिए छतीसगढ़ का उदाहरण दिया जाता है पर बहस वहीं आकर ठहरती है कि सीएम तो नक्सलवाद प्रभावित इस राज्य का भी ऊंची जाति से ही आते हैं.

6. गुजरातराज्य की सीएम आनंदीबेन पटेल भी जमींदार जाति से आती हैं. बाताया जाता है कि वे पीएम मोदी की करीबी हैं. गुजरात में पीएम मोदी की मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं होता. पर जब ऐसे राज्य में भी सीएम चुनने का मौका आया तो पीएम को ऊंची जाति कि एक महिला नहीं बल्कि महिला सहियोगी को चुना जिनका मोदी के गुजरात कैबिनेट में काम करने का लंबा अनुभव रहा है.

7. राजस्थानवसुंधरा की जाति छोड़िया वो राजघराने से आती हैं और उनके अनेक महल हैं. वैसे राजस्थान की सीएम के रिश्ते बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और पीएम मोदी से अच्छे नहीं हैं पर वे बीजेपी की सीएम हैं. वसुंधरा की खुद की जाति राजपूत है, लेकिन शादी राजघराने में तो हुई है पर जाति बराबर की नहीं है. वैसे जब आप राजधराने से होते हैं तो आपकी जाति मायने नहीं रखती.

अगर बीजेपी इसी ढर्रे पर चलती रही और बिहार में बीजेपी की सरकार बनी तो पूरी संभावना है कि राज्य में सवर्ण सीएम होगा, वही पिछड़ी जाति की राजनीति पर ब्रेक लग सकता है और सत्ता पर उनकी पकड़ ढीली पड़ सकती है.

पीएम मोदी के नेत़त्व में चुनाव लड़े जाने वाली बात भी अब एक जुमला लगती है. ऐसे में ऊपर दिए गए उदाहरणों को देखें तो इस बात पर यकीन करना मुश्किल नहीं कि अगर बीजेपी बिहार चुनाव जीतती है तो राज्य में सवर्णों के बर्चस्व वाली राजनीति की तगड़ी वापसी देखने को मिल सकती है. इस स्थिति में सोशल इंजिनियरिंग, सोशल जस्टिस, महिला सशक्तिकरण और सेक्यूलरिज़म भी जुमले बन जाएंगे. लेख में मुस्लमानों के सीएम बनने या नहीं बनने पर इसलिए ज़ोर नहीं दिया गया है क्योंकि आप बीजेपी में उनकी स्थिति साफ़ देख सकते हैं.

नोटशिवराज सिंह चौहन सीएम के तौर पर इस लिस्ट में अपवाद हैं. वे ऊंची जाति से नहीं आते.

एक ही थाली के चट्टे बट्टे नज़र आते हैं शरीफ-मोदी

[box]By Rahul[/box]

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शंघाई सहयोग संगठन में भारत और पाक ने आतंकवाद के मुद्दे पर सहमति जताई थी लेकिन पाकिस्तानी पीएम नवाज़ शरीफ ने देश लौटते ही 26/11 हमले के आरोपी आतंकवादी लकवी की आवाज़ का नमूना देने से इंकार कर दिया. उन्होंने बड़ा बेतुका सा कारण देते हुए कहा कि पाक कानून आरोपी की ख़ुशी के खिलाफ जानें को इजाजत नही देता है. अगर ऐसा ही था तो इतने सालों से प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए यह पता नहीं था या भारत को बेवकूफ बनाने का कार्यक्रम चल रहा था?

इस मुलाकात में कश्मीर का मुद्दा छुआ तक नहीं गया. ऐसे में कश्मीर समस्या का समाधान कैसे होगा समझ से परे है या यहाँ भी सैनिकों को राष्ट्रवाद के उसूलों के लिए सूली पर चढ़ाया जाता रहेगा.

मोदी के शपथ ग्रहण से लेकर शंघाई तक दोनों देशों के रिश्तों में कई उतार चढ़ाव देखने को मिले हैं चाहे वो मोदी का पाक से बातचीत करने से इंकार करना हो या फिर दोबारा शुरुआत जिसका विरोध एनडीए सहियोगी शिवसेना ने भी किया.

पाक में हिन्दू मन्दिर तोड़े जाते है. हिंदुओं की स्थिति का अंदाजा बहोरा समुदाय पर होने वाले हमलों से भी लगाया जा सकता है. दूसरी तरफ भारत भी पिछडा नहीं है क्योंकि पिछले एक साल में घर वापसी, लव जिहाद, गीता संस्कृत सारे मुद्दे आज भी जिन्दा हैं.

विदेश निति में पाक भी पीछे नहीं रहा है. इसका एक कारण यह भी है कि अभी हाल ही में चीन ने करीब 46 अरब डॉलर और रूस ने 20 अरब डॉलर के निवेश का समझौता किया है जो कि खुद में बड़ी सफलता है लेकिन जैसेजैसे भारत अमेरिका के पास जा रहा है पाकिस्तान अमेरिका से दूर और चीन, रूस के करीब होता जा रहा है. जोकि दोनों का दोहरा मापदंड है क्योंकि पहले रूस भारत का बड़ा दोस्त था अब अमेरिका है. वैसे ही समीकरण पाकिस्तान के साथ भी बदले हैं.

बहरहाल देखना होगा दोनों देश राष्ट्रवाद को कितना बेचते है क्योंकि आज तक खबरों में हमे एक ही तरफ की ख़बर मिलती है जिसमें पाक ने दोबारा हमला किया जैसी ख़बरें होती हैं और दूसरी तरफ भारत के लिए यही बात कही जाती है. दोनों देशों की जनता को उलझाए रखने का यही सबसे आसान तरीका तरीका है.

अंत में दोनों नेता एक ही थाली के चट्टे वटटे नजर आते है और कुछ नहीं!

पीएम ने मानवीय आधर पर चुप्पी साध रखी है

[box]By Rahul[/box]

1-pm modi

5 देशों के दौरे पर निकले प्रधानमंत्री मोदी ने कजाकिस्तान के साथ 5 समझौते किए हैं जो कि देश के लिए फायदेमंद है इसी के साथ मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया का प्रचार भी किया लेकिन एक तबका आरोप लगा रहा है कि पीएम देश में छिड़े बवाल को किनारे करके भाग गए हैं और इसी वजह से विपक्ष मोदी की मौनमोदी भी बुला रहा है.

कहीं मोदी भी मानवीयता के आधार पर तो मूक नहीं बने हुए

भ्रष्टाचार से जु़ड़े मुद्दों में जब नए नाम उछले तब उनमें मंत्री विनोद तावड़े और पंकजा मुंडे का घोटालों में नाम आया. ललितगेट से मशहूर ललिता मोदी के पूरे मामले में वे खुद सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं. ऐसा शायद ही होता है जब एक आरोपी सीबीआई जांच की मांग कर रहा हो. वहीं प्रधान सेवक ने मौन स्थिति धारण कर रखी है. पता नहीं कि कहीं मोदी भी मानवीयता के आधार पर तो मूक नहीं बने हुए, चुप्पी तोड ही नहीं रहे.

पैनी निगाहों वाले पीएम चूंके निशाना

वैसे, पैनी निगाहों वाले पीएम की निग़ाहें कहां थीं जब विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, ललित मोदी की सहायता कर थीं और वसुन्धरा तो कई कदम आगे निकल गईं. विपक्ष की नेता और संवैधानिक पद पर होने के बावजूद ललित मोदी को सहायता पहुंचाने वाले दस्तावेजों पर दस्तखत तक कर दिए और बात भी दबा दी.

सीएम शिवराज सीबीआई जाँच के लिए माने पर पीएम ने चुप्पी नहीं तोड़ी

ललितगेट अभी चल ही रहा है और इधर व्यापम के आरोपियों और जांचकर्ताओं की धड्डले से मौत हो रही है. करीब 500 आरोपी भी फरार हैं. मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज सीबीआई जाँच के लिए मान गए पर नसीब वाले पीएम ने अपनी चुप्पी नही तोड़ी.

पर मोदी इनपर भी नहीं बोलते. चलो कोई नहीं!

चलिए इसे छोड़िये लेकिन घर वापसी, बेटी बचाओ बहु लाओ, और लव ने जो जिहाद फैला रखा है उस पर तो एक्शन ले ही सकते थे पीएम पर भाषण दे कर कट लिए. जब हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर जी लड़कियों की जीन्स पर पाबंदी लगाने पर उतारू हैं तब ऐसे में सेल्फ़ी विद डॉटर और बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ कैसे सफल होगा. पर मोदी इनपर भी नहीं बोलते. चलो कोई नहीं!

पर पीएम चुप हैं!

संविधान की शपथ लेते वक्त समानता के अधिकार और सुरक्षा का अधिकार का जिक्र हुआ था पर आरक्षण को जाट और गुजर के बीच प्रसाद की तरह बांटा जा रहा है लेकिन इस बीच दलितों और मुस्लिमों कि याद नही आई जिन्हें आरक्षण की शायदा ज्यादा जरुरत है. 26 जनवरी 2015 को धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी शब्दों को हटाने की मांग की और हमारे प्रिये मंत्री रवि शंकर जी ने इसको लेकर सहमती भी जता दी और अब राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह को राष्ट्रगन में अधिनायक शब्द से समस्या हो गयी. पर पीएम चुप हैं.

मैथ्स की जगह आईआईटी में गीता और संस्कृत पढ़ना शुरू कर दिया जाए

ख़बरों की मानें तो एसआरएफटी आई और एफटीआईआई को सेंट्रल एक्ट के तहत लानें की मंशा जताई गई है और बाद में इसमें आई आई टी और आईआईएम को भी लाया जाएगा. अब शिक्षा, सिनेमा और इंजीनियरिंग का भी बंटाधार हो गएगा. हो सकता है मैथ्स की जगह आईआईटी में गीता और संस्कृत पढ़ना शुरू कर दिया जाए.

मोदी बोलें भी तो क्या बोलें

इन सब के बाद मोदी बोलें भी तो क्या बोलें. पीएम से अपील है कि अब बोलिएगा ही मत क्योंकि हर दिन कोई न कोई बवाल खड़ा हो जाता है अब जब बवाल खड़ा करने वाले नहीं समझते की मोदीजी मौनासन योग कर रहे हैं तो अपनी बला से.

राहुल गांधी की आवाज़ लौट आई है

बताते चलें कि अपनी सरकार के दौरान मौनासन कर रहे राहुल गांधी की आवाज़ लौट आई है और वो बोलने लगे हैं.

पीएम मोदी के डिजिटल इंडिया में हैं कई लूप-होल्स

[box]By Rahul[/box]
DustbinDubba.com

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महत्वाकांक्षी योजना डिजिटल इंडिया का उद्घाटन किया जिसके तहत विश्वविद्यालयों और 2.5 लाख़ स्कूलों में वाई फ़ाइ उपलब्ध कराया जाएगा. इसके साथ-साथ पंचायतों को भी टेक्नॉलजी के सहारे जोड़ा जाएगा. ई-गवर्नेंर्स, ई-टेंडर और ई-सर्विसेज़ दी जाएंगी. जिसमें 18 साल की उम्र से अधिक के लोग अपना खाता विवरण, दस्तावेज़ जानकारी, ई सिग्नेचर आदि रख सकते हैं.
 उपर दी गई जानकारी तो हुई डिजिटल इंडिया से जुड़ी बेसिक जानकरी हुई अब मुद्दे पर आते हैं.
 
एक और कांग्रेसी योजना हाइजैक
कांग्रेस सरकार ने 2006 में ऐसी ही एक राष्ट्रीय योजना बनाई थी. इसका नाम ई-गवर्नेंस योजना था. डिजिटल इंडिया इसी का बड़ा रूप है. भारत के डिजिटल हो जाने के बाद डाक्टर अब किडनी के इलाज के लिए गोली से पहले किडनी ट्रांसप्लांट की राय देगा. है ना हास्यपद!
कहां से आएगा फंड
इस योजना में 4.5 लाख करोड़ लगेंगे. इतना पैसा कहा से आएगा ये सोचना वाली बात है. रिलायंस कंपनी के करता धरता अंबानी जब इस कार्यक्रम के दौरान भाषण दे रहे थे तब मेरे 3जी इन्टरनेट के नेटवर्क ही गायब हो गया.
115वां से पहले नंबर का कोई रोडमैप नहीं
डिजिटल वर्ल्ड में भारत का स्थान दुनिया में 115वां हैं. इसका मतलब है कि इंटरनेट साक्षरता और नेटवर्क समस्या का कोई समाधान नहीं हुआ है. ऐसे में ‘डिजिटल इंडिया’ कैसे सफल होगा दिमाग से परे है.
नहीं है डेटा संरक्षण कानून
रविश की रिपोर्ट देखकर पता लगा कि भारत में डेटा संरक्षण कानून ही नहीं है. इसका मतलब है कि अमेरीका हमारे नाक में कभी भी दम कर सकता है.
नेट न्यूट्रैलिटी की लड़ाई हार कैसे पटेगी गरीबी और अमीरी की खाई
पीएम मोदी के अनुसार इस योजना से गरीबी और अमीरी की खाई कम होगी. पर कैसे ये नहीं पता! क्योंकि नेट न्यूट्रैलिटी के मुद्दे पर टेलीकॉम कम्पनियों ने इंटरनेट महँगा करने का एलान किया और इंटरनेट महंगा हुआ भी! ऐसे में गरीबी की खाई कैसे कम होगी?
बहरहाल भारत में इंटरनेट यूजर्स सिर्फ 15 करोड़ के आस-पास हैं. देखना बनता है कि नई शराब सही छलकती है के बोतल टूट जाती है.