जाने-अंजाने में मोदी सरकार कहीं नॉन वेज को बढ़ावा तो नहीं दे रही

‘अच्छे दिन आने वाले हैं’…आपको मोदी सरकार का ये वादा तो याद ही होगा! लेकिन जो हालात हैं उन्हें देखकर सबकुछ उल्टा-पुल्टा सा लगता है. देश के तमिलनाडू और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में हालात ये हैं कि एक आबादी ने तो दाल छोड़कर मुर्गी और अंडा खान चालू कर दिया है. वहीं चुनाव के दौर से गुज़र रहे बिहार के लोगों ने बताया कि उन्होंने तो चावल के साथ दाल की जगह चटनी को सहारा बना लिया है. वोटर्स के एक तबक के कहना है कि वो यह नहीं समझ पा रहे कि दाल की बढ़ी कीमतें चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बन पाईं.

दिल्ली में अरहर दाल 180 रुपए किलो बिक रही है. वहीं चिकन की कीमत 130 रुपए किलो है. आप दाम में फर्क खुद कर लीजिए. बाकी की दालें भी 100 रुपए से महंगी बिक रही हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि जल्द ही दाल की कीमतें 200 के पार चली जाएंगी. साल 2013 में एक रिपोर्ट में ये तो ज़रूर बता दिया गया कि लोगों के गुज़ारे के लिए 32 रुपए रोज़ाना की रकम काफी हैं लेकिन इस बात पर रौशनी कौन डालेगा कि 180 रुपए किलो की दाल में 25 रुपए रोज़ाना का गणित कैसे बैठेगा.

ब्राहम्ण-बनियों की सरकार मानी जाने वाली बीजेपी के नेता एक तरफ तो बीफ बैन का विरोध कर रहें हैं वहीं सरकार जाने-अंजाने में नॉन वेज को बढ़ावा दे रही है. लेकिन इन सब में वो तबका हमेशा ठगा सा महसूस कर रहा है जिसे अच्छे दिन के सपने दिखाए जाते हैं. बिहार चुनाव में एक बार फिर से जाति और धर्म मुख्य मुद्दा बन गए हैं. वोटर्स से बात करने पर गाय पर हो रही राजनीति सतह पर आ जाती है लेकिन 8 नंबवर को जब विधानसभा चुनाव के नतीजे आ जाएंगे और अगले पांच साल के लिए सरकार तय हो जाएगी तब कोई गाय की बात नहीं करेगा और महंगाई जस की तस बनी रहेगी. वोटर एक बार फिर थोड़ा उनकी वजह से और थोड़ा खुद की वजह से ठगा जाएगा और अच्छें दिनों के इंतजार में ये सरकार भी बीते जाएगी और पाले आएगा कोई नया जुमला!

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