कुलकर्णी पर फेंकी गई स्याही को तेज़ाब बनते देर नहीं लगेगी

साल 2011 में पाकिस्तान के पंजाब सूबे के तत्कालीन गवर्नर सलमान तासीर के कत्ल की ख़बर ने पाकिस्तानियों के साथ बाकी दुनिया को भी सकते में डाल दिया था. तब शायद ही किसी को गुमान हुआ कि ये ऐसे घटनाएं भारत में भी घटने लग जाएंगी. दरअसल, सलमान तासीर को उनके दो बॉडी गार्ड्स ने इसलिए मौत के घाट उतार दिया था क्योंकि वे पाकिस्तान के ईशनिंदा (पैगंबर मोहमम्द आलोचना) के तत्कालीन कानून से इत्तेफाक नहीं रखते थे. सलमान तासीर अपने ही मज़हब में मौजूद कमज़ोरियों के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई में मार दिए गए. वे मुसलमान थे,पाकिस्तानी थी, ऊंचे ओहदे पर विराजमान थे, लेकिन धर्म के उन्माद ने उनकी जान ले ली.

अब आज के भारत में लौटते हैं. सुधींद्र कुलकर्णी पर शिवसेना वालों ने इसलिए स्याही फेंक दी क्योंकि वे पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शिद महमूद कसूरी की किताब के लॉन्च के प्रमुख आयोजक थे. कुलकर्णी बीजेपी के लौहपुरुष अडवाणी के मीडिया सलाहकार रहे हैं. जब इस दौर का इतिहास लिखा जाएगा तब अडवाणी का नाम भारत के विराट हिंदुओं में लिखा जाएगा. उनका नाम शायद बाला ठाकरे जैसे विराट हिंदू से तो  ऊपर ही होगा. कुलकर्णी हिंदू हैं,भारतीय भी हैं. अडवाणी जैसे विराट हिंदू के सलाहकार भी रहे हैं,लेकिन इन सबके बावजूद उन्हें बख्शा नहीं गया. कुलकर्णी के मुंह पर स्याही फेंककर शिवसेना ने खुद को ज़्यादा हिंदू और ज़्यादा भारतीय साबित कर दिया. ठीक वैसे ही जैसे सलमान तासीर के हत्यारों ने उनकी हत्या करके खुद को ज़्यादा मुसलमान, बड़ा मुसलमान साबित किया था.

साल 2014 में पाकिस्तान के शहर पेशावर में एक आर्मी स्कूल पर आतंकी हमला हुआ, इसमें 145 लोगों की हत्या हुई, जिनमें ज़्यादातर छोटे-छोटे मासूम स्कूली बच्चे थे. हमले करने वाले किसी दूसरे देश से नहीं आए थे, बल्कि पाकिस्तान सरकार के जरिए पाले गए सगे आतंकवादी थे. पाकिस्तान इस्लाम, भारत विरोध और कश्मीर के नाम पर इन्हें सालों से पालता आया है. आज इनके पालतू इन्हें ही नोच रहे हैं.

पिछले कई महीनों से भारत भी पाकिस्तान हो चला है. अगर आप इसी तरह बर्दाश्त करते रहे तो आपको पता भी नहीं चलगा कि स्याही कब तेज़ाब बन गई. आप पाकिस्तान और उन जैसे धर्म के उन्माद से भरे देशों की हालत देख सकते हैं. किसी की नफरत को आधार बनाकर पलने वाला देश पाकिस्तान हो जाता है. अब हमें ये तय करना होगा कि सालों से धार्मिक भाईचारे की परंपरा के बूते टिके रहने वाली धरती को उसी ढर्रे पर बरकरार रखना है या आतंकवादियों और दहशतगर्दों को सौंप देना है?

सलमान तासीर के तर्ज पर हम पहले से ही कलबुर्गी, पनसारे और दाभोलकर को खो चुके हैं, अगर ऐसी ही गुंडई जारी रही तो कल गए ये आंतकी हमारे बच्चों के स्कूलों पर भी हमला करने लगेंगे. हमें इनका जमकर सामना करना पड़ेगा…समाज के लिए, देश के लिए,मानवता के लिए और अपने बच्चों के भाविष्य और उनकी जान के लिए!

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