एक पत्रकार का समाज को खुला खत!

राजनीति की कड़िया सुलझाते-सुलझाते अब मैं खुद में ही उलझने लगा हूँ, अपने अस्तित्व पर ही सवाल करने लगा हूँ. समझ नहीं पाता मैं क्या हूँ? क्या मैं दलाल हूँ, वेश्या हूँ या फिर न्यूज ट्रेडर हूँ? क्या मैं सचमुच प्रेस्टीट्यूड हूँ? क्या मैं वो नहीं हूँ जो रोजाना गलियों में पिटता है, कभी निर्भया तो कभी गुडिया के लाठी खाता है? क्या मैं वो नही हूँ जो कभी शाहजहाँबाद तो कभी बलघाट में जलाया जाता हैं? क्या मैं वो नही हूँ जो कभी आपातकाल तो कभी दंगों में उन लोगों के लिए खड़ा होता हूँ जो कभी मेरे लिए खड़े नहीं हुए? इन सिक्के के दो पहलुओं से मिलकर ही तो मैं बनता हूँ. मुझसे ओब्जेक्टिविटी की आशा करने वाले बुध्दजीवी हमेशा मेरे लिए दलाल और प्रेस्टीट्यूड जैसे विशेषणों का ही इस्तेमाल करते हैं. उन्हें मैं नेताओं के घर आते जाते तो दिखता हूँ पर देश के पाँच सबसे गरीब जिलों में भटकते हुए नहीं. क्या वो मेरे सिक्के के सिर्फ एक पहलू को नहीं देखते हैं?

लोग मेरे सामने खड़े होकर ही मुझे गाली देते हैं. मेरी विश्वसनीयता पर सवाल करते हैं. अच्छा है कि बोलते है, सवाल करते है, मुझसे डरते नहीं. कभी सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ बोलकर देखिए. गालियों से आपकी बोलती बंद न कर दी जाये तो कहना. आप 19(a) से लेकर 66(a) सब भूल न जाए तो कहना. लेकिन मैं फिर भी लिखता हूँ हर रोज लिखता हूँ. क्यों लिखता हूँ? किसके लिए लिखता हूँ? मैं लिखता हूँ क्योंकि मुझे परवाह हैं आपकी. मैं चुप हो गया तो आवाज आपकी बंद होगी. कोई शक हो तो सोच कर देखिए कि जिन लोगों की आवाज मैं नहीं उठाता क्यों उनकी आवाज दब कर रह जाती हैं? गुड़गाँव, सूरत और दिल्ली की मजदूर बस्तियों में गुलामों की तरह रहने वाले मजदूर तभी चर्चा में क्यों आते हैं जब मैं वहाँ जाता हूँ? आपके चुने हुए प्रतिनिधियों के सामने आपका प्रतिनिधित्व मैं करता हूँ. आप मुझे चुनते नहीं,वोट नहीं देते. मुझे 6 रुपये में खाने की थाली नहीं मिलती, रहने को सरकारी घर नहीं मिलता. फिर मैं क्यों करता हूँ ये सब आपके लिए, उनके लिए जिनके लिए मैं महज एक दलाल हूँ, सत्ता और कॉरपोरेट का दलाल? मैं सरकार बना सकता हूँ, गिरा नहीं सकता. मैं मोदी और केजरीवाल बना सकता हूँ, उनसे काम नहीं करा सकता. मैं ताकतवर की तरफ होने पर ताकतवर होता हूँ कमजोर की तरफ होने पर कमजोर होता हूँ. लेकिन मैं कमजोर नहीं हूँ. मैं देश के प्रधानमंत्री की भी आँखों में आँख ड़ाल सवाल कर सकता हूँ. कमजोर आप हैं क्योंकि आप सवाल नहीं करते. नेताओं को पता है कि मैं कितनी भी मजबूती से आपके लिए खडा रहूँ आप को चुनना उसी को है. आपकी यही कमजोरी मुझे कमजोर करती हैं.

फिर भी मैं आपके सवालों पर, आरोपों पर चुप रह जाता हूँ. इसलिए नहीं की मैं सचमुच दलाल हूँ बल्कि इसलिए कि मैं खुद मे ही उलझने लगा हूँ खुद से ही सवाल करने लगा हूँ. मेरे अंदर भी एक द्वंद है क्योंकि मैं यहाँ कुछ बदलने आया था. पर मुझे हर पल सीख दी गई कि मैं कोई समाज सेवक नहीं हूँ, क्राँतिकारी नहीं हूँ. मेरी नैतिकताओं से मुझे ही बंधक बना दिया गया. और शायद धीरे-धीरे मैंने भी समझौता कर लिया. और करूँ भी क्यूँ न? सारी बगावत मैं ही नहीं करुंगा. कुछ जिम्मेदारी आपकी भी बनती है. फिर भी मेरी आत्मा मेरे शरीर से हर रोज सवाल करती है, बगावत करती है. मैं मरता भले ही न हूँ पर खुद मे ही घुटता जरूर हूँ. मुझे अपने ही आदर्शों और उम्मीदों की अर्थी का बोझ उठा कर चलना होता हैं. शायद इसलिए मैं आपके सवालों का जवाब नहीं दे पाता और जवाब भी क्यूँ और किसके लिए? उन नपुंसक लोगों के लिए जो अपनी असफलताओं को हमेशा मेरे ऊपर थोप देते हैं. सारी समस्याओं का जवाब मुझसे माँगा जाता है. जब कोई गजेन्द्र सिंह जंतर-मंतर पर फाँसी लगा लेता है तो मुझसे पूछा जाता है कि मैंने कैमरा छोड़ उसे बचाया क्यों नहीं? यह सवाल मुझसे बड़ी बेशर्मी के साथ वही लोग पूछ रहे होते है जो वहाँ किसी पार्टी के कार्यकर्ता या पुलिस वाले के रूप मे खड़े होते हैं. वोट आप देते हो, चुनते नेता को है तो समस्याओं का हल मुझसे क्यों? जब सारे काम मुझे ही करने है तो आप है ही क्यों? जब सारी परंपरा और लोग शिथिल हो चले है तो लोकतंत्र, व्यवस्था और चुनाव का इतना बड़ा ड्रामा क्यों?

सच कहूँ तो लोकतंत्र के असली गुनहगार आप ही हैँ. बस अपनी कायरता थोपने के लिए आपको कोई कमजोर चाहिए होता है. और मुझसे कमजोर आपको कौन मिलेगा? आप जाति, धर्म, परिवार के नाम पर दंगाई, बलात्कारियों, गुंड़ो को वोट देते है. वो घोटाले करते है आप चुप रहते हैं, वो गुंड़ई करते है आप चुप रहते है. किसान मरता है आप चुप रहते है, मजदूर मरता है आप चुप रहते है. ईमानदार अफसर कुचले जाते है आप चुप रहते है, मैं जलाया जाता हूँ आप चुप रहते हैँ. और आपकी बारी आती है तो आप रोते है. लोकतंत्र, मीडिया, अधिकार आपको सब याद आते है. खुद से कभी पूछा है कभी कहाँ होते है आप जब दलित महिलाओं से बलात्कार होता है? कहाँ होते है आप जब आदिवासियों के घर, जंगल और जमीन छीने जाते है? शायद सेल्फी ले रहे होते है उस रेस्टोरेन्ट में जहाँ किसी बच्चे से मजदूरी कराई जाती है. मुझे समस्या इस बात से नही कि आप चुप रहते है. मुझे समस्या इस बात से कि आप सबकुछ जानकर भी चुप रहते है. मुझे कभी भी आप से बात करते हुए यह नही लगा कि आपको कुछ नही पता होता.

आप बस कुछ न पता होने का ढ़ोग करते है ताकि मुझ पर आरोप लगा सके कि मैंने आपको कुछ बताया नहीं. मुझे तो आपसे ही पता चलता है कि नेता चोर है, बेईमान है, दंगाई है. पर जब उन्ही नेताओं को संसद और विधानसभाओं में बार-बार चुनकर आते हुए देखता हूँ तो मुझे यकीन हो जाता है कि आप पक्के दोमुंहे है, कायर है. बार-बार गलती करने वाले को गुनहगार कहा जाता है और आप भी गुनहगार है, लोकतंत्र के असली गुनहगार है. आप इन सम्मानित नेताओं को इसलिए चुन कर नहीं भेजते है कि आप अज्ञानी है, अबोध है. दरअसल आप ही दंगाई है, गुंडे है. क्या आप वो नहीं है जो दंगों मे हिन्दू और मुस्लिम मे बँट जाते है? सोशल मीडिया पर भर-भर कर गाली देने वाले भी आप ही होते है न. क्या आप वो नहीं है जो दलितों का शोषण करता है? क्या आप वो भी नहीं है जो गरीबों और मजदूरों का शोषण करता है?

क्या आपको वाकई हक है कि आप मुझसे सवाल कर सके? पर मैं फिर भी आपके आरोपों को झेलता हूँ क्योंकि मैं is equal to करने पर विश्वास नही रखता. मैं सफाई नही दे रहा. मैं बस आपको समझा रहा हूँ कि अपनी असफलताओं को मुझ पर मत थोपिए. पर चुप भी मत रहिए, कुछ बोलिए आपकी चुप्पी आने वाली पीढ़ियों को खामोश करेगी. मेरे अंदर भी काफी कुछ गलत है, इसलिए मेरे खिलाफ भी बोलिए. पर केवल मेरे खिलाफ ही मत बोलिए. जो भी गलत है उसके खिलाफ बोलिए. कभी-कभी अपने खिलाफ भी बोलिए. चंद लोगों को भ्रम हो चला है कि आप गूँगे है इसलिए चुप मत रहिए, बोलिए जनाब. जिस दिन आप बोलेंगे मुझे बोलने की जरूरत नहीं पड़ेगी. मैं तो बोलता हूँ क्योंकि आप नहीं बोलते. मैं आपके हाथों मे श्रध्दाँजलि और सांत्वना की मोमबत्ती नहीं आक्रोश की मशाल देखना चाहता हूँ. मैं जानता हूँ और मानता भी हूँ कि हम में कोई क्रांतिकारी नहीं है. पर अब समय आ गया कि हम विद्रोह करे. व्यवस्था से नही तो खुद से ही करे. एक बार बगावत करके तो देखिए, बगावत से प्यार न हो जाए कहिएगा. बगावत ही लोकतंत्र का असली स्वरूप है. और अगर आप ऐसा नहीं करें तो आप गुनहगार होंगे. लोकतंत्र के गुनहगार, आने वाली पीढ़ियों के गुनहगार.

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